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Eid-e-Milad-un-Nabi hai dil bada masroor hai

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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ईद-ए-मिलाद-उन-नबी है दिल बड़ा मसरूर है हर तरफ है शादमानी रंज-ओ-ग़म काफ़ूर है इस तरफ जो नूर है तो उस तरफ भी नूर है ज़र्रा ज़र्रा सब जहां का नूर से मामूर है हर मलक है शादमां ख़ुश आज हर एक हूर है हां! मगर शैतान मअ ऱफ़क़ा बड़ा रंजूर है आमद-ए-सरकार से ज़ुल्मत हुई काफ़ूर है क्या ज़मीन क्या आसमां हर सम्त छाया नूर है जश्न-ए-मिलाद-उन-नबी है क्यों न झूमें आज हम मुस्कुराती हैं बहारें सब फ़ज़ा पुर-नूर है हो रही हैं चार जानिब बारिशें अनवार की दश्त-ओ-कोहसार-ओ-चमन हर शय पे छाया नूर है मिल के दीवानो! पढ़ो सारे दुरूद अब झूम कर आज वो आया जहां में जो सरापा नूर है आमिना तुझ को मुबारक शाह का मिलाद हो तेरा आंगन नूर, तेरा घर का घर सब नूर है ग़मज़दा! तुम को मुबारक! ग़म ग़लत हो जाएंगे आ गया वो जिस के सदक़े हर बला काफ़ूर है आज दीवाने मदीने के सभी हैं शादमां बैठे आक़ा की विलादत से हर एक मसरूर है बख़्शिश दे मुझ को इलाही बहर-ए-मिलाद-उन-नबी नामा-ए-आमाल इसयां से मेरा भरपूर है गुंबद-ए-ख़ज़रा का उस को भी तो अब दीदार हो या-इलाही! जो मदीने से अभी तक दूर है आप की नज़र-ए-करम से काम बनते ही गए वरना आक़ा ये गदा तो बे-कस-ओ-मजबूर है या-इलाही! अपने प्यारे का अता हो ग़म मुझे ख़ुश नसीबी उस की उन के ग़म में जो रंजूर है शान क्या प्यारे अमामे की बयां हो या नबी तेरे नअल-ए-पाक का हर ज़र्रा रश्क-ए-तूर है सद करोड़ अफ़सोस! फ़ैशन की नहूसत छा गई आह! एक तादाद उन की सुन्नतों से दूर है "हूं ग़ुलाम-ए-मुस्तफ़ा" अपना तो दावा है यही काश! आक़ा भी ये फ़रमा दें हमें मंज़ूर है वो पिलाए अह्ल-ए-महशर देखते ही बोल उठें आ गया अत्तार देखो इश्क़ में मख़मूर है