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Ek baar phir Madine Attar ja rahe hain

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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एक बार फिर मदीने अत्तार जा रहे हैं आक़ा मदीने वाले दर पर बुला रहे हैं क़िस्मत को इस तसव्वुर से वज्द आ रहा है रहमत की भीख देने आक़ा बुला रहे हैं वो फ़ैज़ का ख़ज़ाना हर दम लुटा रहे हैं अनवार हर तरफ़ ही तय्यबा में छा रहे हैं जो कोई उन के ग़म में आँसू बहा रहे हैं जीने का लुत्फ़ ऐसे उश्शाक़ पा रहे हैं जिस दम मदीने आएं रोएं पिछड़ें खाएं हम माँग तुम से आक़ा ऐसी अदा रहे हैं हुस्न-ए-अमल हमारे पल्ले में कुछ नहीं है आहों की आँसुओं की सौग़ात ला रहे हैं मंज़र है रूह परवर रौज़े की जालियों पर उश्शाक़ आँसुओं के मोती लुटा रहे हैं आक़ा! हमें ये आँखें बस आप ही के ग़म में हाए हमें ज़माने के ग़म रुला रहे हैं इज़्न-ए-ख़ुदा से हो तुम मुख्तार-ए-हर दो-आलम दोनों जहाँ तुम्हारी ख़ैरात खा रहे हैं दस्तूर है कि जिस का खाना उसी का गाना हम जिस का खा रहे हैं गीत उस के गा रहे हैं मस्कन बने मदीना मदन बने मदीना अहमद रज़ा का तुम को देते वास्ता रहे हैं आक़ा! बुलाओ उन को बे-चैन मुज़्तरिब जो दिल को जला रहे हैं आँसू बहा रहे हैं जिन का न भाव कोई दुनिया में पूछता हो सीना से उन को आक़ा अपने लगा रहे हैं उम्मत के हाल से हैं आगाह हर घड़ी आप ख़्वाबों में आ रहे हैं बिगड़ी बना रहे हैं दुनिया के ग़म ने मारा लिल्लाह दो सहारा सरकार ठोकरें हम दर दर की खा रहे हैं अब घेर चुकी है आक़ा तूफ़ान में अपनी नैया ऐ नाख़ुदा सहारा मांग आप का रहे हैं आक़ा हुज़ूर-ए-अनवर! नज़र-ए-करम हो हम पर अब्र-ए-सियाह-ए-दिल पर इसयां के छा रहे हैं चश्म-ए-करम हो जानां सू-ए-गुनाहगारों सरकार! नफ़्स-ओ-शैतान हर दम दबा रहे हैं उन सब मुबल्लिग़ों के ख़्वाबों में अब करम हो आक़ा जो सुन्नतों की ख़िदमत बजा रहे हैं परवरदिगार-ए-आली दे जज़्बा-ए-ग़ज़ाली कर हम को ख़ुश ख़िसाली कर ये दुआ रहे हैं बीमारी-ए-गुनाह से हम को शफ़ा दे या रब बन जाएं नेक हम सब इल्तिजा रहे हैं दौलत की हिर्स दिल से अल्लाह दूर कर दे इश्क़-ए-रसूल दे दे कर ये दुआ रहे हैं तकसीर-ए-माल-ओ-ज़र की हरगिज़ नहीं तमन्ना हम मांग आप से बस ग़म आप का रहे हैं रुख़सत की अब घड़ी है सर पर अजल खड़ी है आजाओ अब ख़ुदारा हम जां से जा रहे हैं अब लहद में अज़ीज़ो! जल्दी उतार भी दो आहा! वो मुस्कुराते तशरीफ़ ला रहे हैं फ़रियाद-ए-जां आलम! कोई नहीं है हमदम सू-ए-सक़र फ़रिश्ते अब ले के जा रहे हैं क़ुर्बान रोज़-ए-महशर दामन का पर्दा ढक कर ऐबों को मेरे सरवर ख़ुद ही छुपा रहे हैं महशर में बंदा परवर लुत्फ़-ओ-करम के पैकर भर भर के जाम-ए-कौसर हम को पिला रहे हैं सदक़े में मुर्तज़ा के सोज़-ए-बिलाल दे दो ये अर्ज़ ले कर आक़ा अत्तार आ रहे हैं उन के करम के सदक़े फ़ज़्ल-ओ-करम पे क़ुर्बान अत्तार को वो ले कर जन्नत में जा रहे हैं