फ़रोग़-ए-अख़्तर-ए-बद्र आफ़ताब-ए-जल्वा-ए-आरिज़
ज़िया-ए-ताले-ए-बद्र उन का आबरू-ए-हिलाली है
वह हैं अल्लाह वाले जो तुझे वाली कहें अपना
कि तू अल्लाह वाला है तेरा अल्लाह वाली है
सहारे ने तेरे गेसू के फेरा है बलाओं को
इशारे ने तेरे आबरू के आई मौत टाली है
निगाह ने तीर-ए-रहमत के दिल-ए-उम्मत से खींचे हैं
मुज़ह ने फांस-ए-हसरत की कलीजा से निकाली है
फ़कीरो बे नवाओ अपनी अपनी झोलियां भर लो
कि बाड़ा बंट रहा है फ़ैज़-ए-सरकार-ए-आली है
तुझी को ख़िलअत-ए-यकताई-ए-आलम मिला हक़ से
तेरे ही जिस्म पर मौज़ूं क़बा-ए-बे मिसाली है
निकाला कब किसी को बज़्म-ए-फ़ैज़-ए-आम से तुम ने
निकाली है तो आने वालों की हसरत निकाली है
दम-ए-हश्र आसी मज़े ले रहे हैं
शफ़ाअत किसी की है रहमत किसी की
रहे दिल किसी की मोहब्बत में हरदम
रहे दिल में हरदम मोहब्बत किसी की
तेरा क़ब्ज़ा कौनैन-ओ-मा फ़ीहिमा पर
हुई है न हो यूँ हुकूमत किसी की
ख़ुदा का दिया है तेरे पास सब कुछ
तेरे होते क्या हम को हाजत किसी की
ज़माना की दौलत नहीं पास फिर भी
ज़माना में बँटती है दौलत किसी की
न पहुँचें कभी अक़्ल-ए-कुल के फ़रिश्ते
ख़ुदा जानता है हक़ीक़त किसी की
हमारा भरोसा हमारा सहारा
शफ़ाअत किसी की हिमायत किसी की
क़मर एक इशारे में दो टुकड़े देखा
ज़माना पे रोशन है ताक़त किसी की
हमें हैं किसी की शफ़ाअत की ख़ातिर
हमारी ही ख़ातिर शफ़ाअत किसी की
मुसीबत-ज़दा शाद हो तुम कि उन से
नहीं देखी जाती मुसीबत किसी की
न पहुँचेंगे जब तक गुनहगार उन के
न जाएगी जन्नत में उम्मत किसी की
हम ऐसे गुनहगार हैं ज़ुहद वालों
हमारी मदद पर है रहमत किसी की
मदीना का जंगल हो और हम हों ज़ाहिद
नहीं चाहिए हम को जन्नत किसी की
हज़ारों हों ख़ुर्शीद-ए-महशर तो ग़म क्या
यहाँ साया-ए-गुस्तर है रहमत किसी की
भरे जाएंगे ख़ुल्द में अहले-इसियां
न जाएगी ख़ाली शफ़ाअत किसी की
वही सब के मालिक उन्हीं का है सब कुछ
न आसी किसी के न जन्नत किसी की
रफ़अना लका ज़िकरक पर तसद्दुक़
सब ऊंचों से ऊंची है रिफ़अत किसी की
उतरने लगे मा रमैता यदुल्लाह
चढ़ी ऐसी ज़ोरों पे ताक़त किसी की
गदा ख़ुश हों ख़ैर-ए-लुक की सदा है
कि दिन दूनी है बढ़ती दौलत किसी की
फ़तरज़ा ने डाली हैं बाहें गले में
कि हो जाए राज़ी तबीअत किसी की
ख़ुदा से दुआ है कि हंगामे-रुख़्सत
ज़बाने-हसन पर हो मदहत किसी की