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फ़िक्र-ए-अस्फ़ल है मेरी मर्तबा आला तेरा

Written by Allama Hasan Raza Khan

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फ़िक्र-ए-अस्फ़ल है मेरी मर्तबा-ए-आला तेरा वस्फ़ क्या ख़ाक लिखे ख़ाक का पुतला तेरा तूर पर ही नहीं मौक़ूफ़ उजाला तेरा कौन से घर में नहीं जलवा-ए-ज़ेबा तेरा हर जगह ज़िक्र है ऐ वाजिद-ओ-यकता तेरा कौन सी बज़्म में रोशन नहीं इक्का तेरा फिर नुमायाँ जो सर-ए-तूर हो जलवा तेरा आग लेने को चले आशिक़-ए-शैदा तेरा ख़ीरा करता है निगाहों को उजाला तेरा कीजिए कौन सी आँखों से नज़ारा तेरा जलवा-ए-यार निराला है ये पर्दा तेरा कि गले मिल के भी खुलता नहीं मिलना तेरा क्या ख़बर है कि 'अला-अल-'अर्श के मअनी क्या हैं कि है आशिक़ की तरह 'अर्श भी जोया तेरा दश्त-ए-ऐमन में मुझे ख़ाक नज़र आए गा मुझ में हो कर नज़र आता नहीं जलवा तेरा हर सहर नग़मा-ए-मुर्ग़ान-ए-नवासंज का शोर गूँजता है तेरे औसाफ़ से सहरा तेरा वहशत-ए-इश्क़ से खुलता है तू ऐ पर्दा-ए-राज़ कुछ न कुछ चाक-ए-गरेबाँ से है रिश्ता तेरा सच है इंसान को कुछ खो के मिला करता है आप को खो के तुझे पाए गा जोया तेरा हैं तेरे नाम से आबादी-ओ-सहरा आबाद शहर में ज़िक्र तेरा दश्त में चर्चा तेरा बर्क़-ए-दीदार ही ने तो ये क़यामत तोड़ी सब से है और किसी से नहीं पर्दा तेरा आमद-ए-हश्र से इक ईद है मुश्ताक़ों को उसी पर्दा में तो है जलवा-ए-ज़ेबा तेरा सारे आलम को तो मुश्ताक़-ए-तजल्ली पाया पूछने जाए अब किस से ठिकाना तेरा खार-ए-सहरा-ए-नबी पाओं से क्या काम तुझे आमरी जान मरे दिल में है रस्ता तेरा क्यों न हो नाज़ मुझे अपने मुक़द्दर पे कि हूँ सग-ए-तेरा बंदा-ए-तेरा माँगने वाला तेरा अच्छे अच्छे हैं तेरे दर की गदाई करते ऊँचे ऊँचों में बिठा करता है सदक़ा तेरा भीख बे-मांगे फ़क़ीरों को जहाँ मिलती है दोनों आलम में वो दरवाज़ा है किसका तेरा क्यों तमन्ना मेरी मायूस हो ऐ अब्र-ए-करम सूखे धानों का मददगार है छींटा तेरा हाए फिर ख़ंदा-ए-बेजा मेरे लब पर आया हाए फिर भूल गया रातों का रोना तेरा हश्र की प्यास से क्या ख़ौफ़ गुनहगारों को तिश्ना-कामों का ख़रीदार है दरिया तेरा सोज़न-ए-गुमशुदा मिलती है तबस्सुम से तेरे शाम को सुबह बनाता है उजाला तेरा सिद्क़ ने तुझ में यहाँ तक तो जगह पाई है कह नहीं सकते उलश को भी झूटा तेरा ख़ास बंदों के तसद्दुक़ में रिहाई पाए आख़िर इस काम का तो है ये निकम्मा तेरा बंद-ए-ग़म काट दिया करते हैं तेरे अब्रू फेर देता है बलाओं को इशारा तेरा हश्र के रोज़ हंसाएगा ख़ताकारों को मेरे ग़मख़्वार दिल-ए-शब में ये रोना तेरा अमल-ए-नेक कहाँ नामा-ए-बदकारन में है ग़ुलामों को भरोसा मरे आक़ा तेरा बहर-ए-दीदार झुक आए हैं ज़मीन पर तारे वाह ऐ जल्वा-ए-दिलदार चमकना तेरा ऊँची हो कर नज़र आती है हर एक शै छोटी जा के ख़ुर्शीद बना चर्ख़ पे ज़र्रा तेरा ऐ मदीने की हवा दिल मरे अफ़्सुर्दा है सूखी कलियों को खिला जाता है झोंका तेरा मेरे आक़ा हैं वो अब्र-ए-करम ऐ सोज़-ए-अलम एक छींटे का भी होगा न ये दोहरा तेरा अब हसन मन्क़बत-ए-ख़्वाजा-ए-अजमेर सुना तब्अ पुर-जोश है रुकता नहीं ख़ामा तेरा रश्क होता है गुलामों को कहीं आक़ा से क्यों कहूं रश्क-ए-वह-ए-बद्र है तलवा तेरा बशर अफ़ज़ल हैं मलक से तेरी यूं मदह करूं ना मलक ख़ास बशर करते हैं मुजरा तेरा जब से तू ने क़दम ग़ौस लिया है सर पर औलिया सर पे क़दम लेते हैं शाहा तेरा मुही-ए-दीन ग़ौस हैं और ख़्वाजा मुईनुद्दीन है ऐ हसन क्यों ना हो महफ़ूज़ अक़ीदा तेरा