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गुम्बद-ए-ख़ज़रा की जिस वक़्त मैं देखूंगा बहार

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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गुम्बद-ए-ख़ज़रा की जिस वक़्त मैं देखूंगा बहार मुझ गुनाहगार की बख़्शिश का बहाना होगा जब सुवालात, नकीरैन करेंगे मुझ से लब पे सरकार की नाअतों का तराना होगा हश्र में जब हमें सरकार नज़र आएंगे कैसा मंज़र वो हसीन और सुहाना होगा तुझ को गर रुतबा-ए-आली की तलब है भाई! ग़ौर से सुन तुझे हस्ती को मिटाना होगा उन की दहलीज़ पे सर अपना झुका दे भाई! देखना सब तेरे क़दमों में ज़माना होगा भाइयो! चाहिए गर रब्ब-ए-मुहम्मद की रज़ा खुद को महबूब की सुन्नत पे चलाना होगा मेरी सरकार के क़दमों में ही इन शा अल्लाह मेरा फ़िरदौस में अत्तार ठिकाना होगा इस बरस भी न मदीने में अगर आई मौत घर को रोते हुए अत्तार रवाना होगा