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गुनाहगार क्या बल्कि हैं अंबिया भी

Written by Maulana Muhammad Jamil-ur-Rehman Razvi

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गुनाहगार क्या बल्कि हैं अंबिया भी तेरी ज़ात पर फ़ख़्र फ़रमाने वाले जगा दे ख़ुदाया मेरा बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता ग़ुलामों की क़िस्मत को चमकाने वाले जो आलम को करते हैं रौशन मह-ओ-ख़ोर वो हैं तेरे ज़र्रों से शर्माने वाले इधर भी कोई बूंद गेसू का सदक़ा मेरे अबर-ए-रहमत के बरसाने वाले जो अच्छों की क़िस्मत में है जाम-ए-तेरा बदों को भी एक बूंद मैखाने वाले है जिन का वज़ीफ़ा अग़िस्नी हबीबी ये हैं उन की इमदाद फ़रमाने वाले जो दुनिया में मुन्किर-ए-इस्तेआना वो होंगे क़यामत में पछताने वाले