गुनाहगार क्या बल्कि हैं अंबिया भी
तेरी ज़ात पर फ़ख़्र फ़रमाने वाले
जगा दे ख़ुदाया मेरा बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता
ग़ुलामों की क़िस्मत को चमकाने वाले
जो आलम को करते हैं रौशन मह-ओ-ख़ोर
वो हैं तेरे ज़र्रों से शर्माने वाले
इधर भी कोई बूंद गेसू का सदक़ा
मेरे अबर-ए-रहमत के बरसाने वाले
जो अच्छों की क़िस्मत में है जाम-ए-तेरा
बदों को भी एक बूंद मैखाने वाले
है जिन का वज़ीफ़ा अग़िस्नी हबीबी
ये हैं उन की इमदाद फ़रमाने वाले
जो दुनिया में मुन्किर-ए-इस्तेआना
वो होंगे क़यामत में पछताने वाले