गुनाहों का अंधेरा छा गया है हम कमीनों पर
ख़ुदारा हो करम नूर-ए-मुजस्सम या रसूलल्लाह
जहाँ जाऊँ जिधर जाऊँ मदीने की फ़ज़ा पाऊँ
मिले लुत्फ़-ए-हुज़ूरी जान-ए-आलम या रसूलल्लाह
तवाफ़-ए-ख़ाना-ए-काबा का तुम मुझ को शरफ़ दे दो
पियूँ मक्के में आ कर आब-ए-ज़म ज़म या रसूलल्लाह
मदीने जब मैं पहुँचूँ तो कलेजा मेरा फट जाए
वहाँ रो रो के अपना तोड़ दूँ दम या रसूलल्लाह
बक़ी-ए-पाक में मुझ को जगह सरकार मिल जाए
तुफ़ैल-ए-पीर-ओ-मुर्शद ग़ौस-ए-आज़म या रसूलल्लाह
हुसैन इब्न-ए-अली के वास्ते कर दो करम जिन का
के है यौम-ए-शहादत-ए-ज़ैल-ए-मुहर्रम या रसूलल्लाह
वही उम्मत ख़ताओं में पड़ी है रात में जिन के
लिए रोया किए मानिंद-ए-शबनम या रसूलल्लाह
शाह! अत्तार का दिल टूट जाए! काश दुनिया से
रहे गुम आप की उल्फ़त में हर दम या रसूलल्लाह