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गुनाहों का अंधेरा छा गया है हम कमीनों पर

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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गुनाहों का अंधेरा छा गया है हम कमीनों पर ख़ुदारा हो करम नूर-ए-मुजस्सम या रसूलल्लाह जहाँ जाऊँ जिधर जाऊँ मदीने की फ़ज़ा पाऊँ मिले लुत्फ़-ए-हुज़ूरी जान-ए-आलम या रसूलल्लाह तवाफ़-ए-ख़ाना-ए-काबा का तुम मुझ को शरफ़ दे दो पियूँ मक्के में आ कर आब-ए-ज़म ज़म या रसूलल्लाह मदीने जब मैं पहुँचूँ तो कलेजा मेरा फट जाए वहाँ रो रो के अपना तोड़ दूँ दम या रसूलल्लाह बक़ी-ए-पाक में मुझ को जगह सरकार मिल जाए तुफ़ैल-ए-पीर-ओ-मुर्शद ग़ौस-ए-आज़म या रसूलल्लाह हुसैन इब्न-ए-अली के वास्ते कर दो करम जिन का के है यौम-ए-शहादत-ए-ज़ैल-ए-मुहर्रम या रसूलल्लाह वही उम्मत ख़ताओं में पड़ी है रात में जिन के लिए रोया किए मानिंद-ए-शबनम या रसूलल्लाह शाह! अत्तार का दिल टूट जाए! काश दुनिया से रहे गुम आप की उल्फ़त में हर दम या रसूलल्लाह