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Gunahon Se Mujh Ko Bacha Ya Ilahi!

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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गुनाहों से मुझ को बचा या इलाही! बुरी आदतें भी छुड़ा या इलाही! ख़ताओं को मेरी मिटा या इलाही! मुझे नेक ख़सलत बना या इलाही! मुतीअ अपना मुझ को बना या इलाही! सदा सुन्नतों पर चला या इलाही! तुझे वास्ता सारे नबियों का मौला! मेरी बख़्श दे हर ख़ता या इलाही! ग़म-ए-मुस्तफ़ा दे ग़म-ए-मुस्तफ़ा दे! हो दर्दे-मदीना अता या इलाही! मैं इश्क़-ए-नबी में रहूँ गुम हमेशा! तू दीवाना ऐसा बना या इलाही! मदीने की मस्ती रहे मुझ पे छाई! सदा या इलाही सदा या इलाही! दिखा हर बरस तू हरम की बहारें! तू मक्का मदीना दिखा या इलाही! शरफ़ हर बरस हज्ज का पाऊँ ख़ुदाया! चले तैबा फिर क़ाफ़िला या इलाही! जो रोते हैं हिज्र-ए-मदीना में उन को! मदीने की गलियाँ दिखा या इलाही! ज़बाँ और आँखों का क़ुफ़्ल-ए-मदीना! अता हो पये मुस्तफ़ा या इलाही! तू मुर्शिद के सदक़े दीवाना बना दे! शहंशाह-ए-बग़दाद का या इलाही! मुझे सुन्नियत पर तू दे इस्तक़ामत, पये शाह-ए-अहमद-ए-रज़ा या इलाही! तू अंग्रेज़ी फ़ैशन से हर दम बचा कर, मुझे सुन्नतों पर चला या इलाही! मुतीअ अपने मुर्शिद का मुझ को बना दे, मैं हो जाऊँ इन पर फ़िदा या इलाही! मुतीअ अपने माँ बाप का मैं करूँ गा, हर इक हुक्म लाऊँ बजा या इलाही! सदा पीर ओ मुर्शिद रहें मुझ से राज़ी, कभी भी न हों ये ख़फ़ा या इलाही! बना दे मुझे एक दर का बना दे, मैं हर दम रहूँ बा-वफ़ा या इलाही! तुझे वास्ता सय्यदा आमिना का, बना आशिक़-ए-मुस्तफ़ा या इलाही! मुझे माल ओ दौलत की आफ़त ने घेरा, बचा या इलाही बचा या इलाही! न दे जाह ओ हशमत न दौलत की कसरत, गदा-ए-मदीना बना या इलाही! मुझे ग़ीबत ओ चुग़ली ओ बदगुमानी, की आफ़ात से तू बचा या इलाही! ये दिल गोर-ए-तीरा से घबरा रहा है, पये मुस्तफ़ा जगमगा या इलाही! बक़ी-ए-मुबारक में तदफ़ीन मेरी, हो, हसनैन का वास्ता या इलाही! तू अत्तार को चश्म-ए-नम दे हर दम, मदीने के ग़म में रुला या इलाही!