है कलाम-ए-इलाही में शम्स ओ ज़ुहा तिरे चेहरा-ए-नूर फ़ज़ा की क़सम
क़सम शब-ए-तार में ये था कि हबीब की ज़ुल्फ़-ए-दोता की क़सम
तिरे ख़ुलक़ को हक़ ने अज़ीम कहा तिरी ख़ल्क़ को हक़ ने जमील किया
कोई तुझ सा हुआ है न होगा शहा तिरे ख़ालिक़-ए-हुस्न ओ अदा की क़सम
वो ख़ुदा ने है मर्तबा तुझ को दिया न किसी को मिले न किसी को मिला
कि कलाम-ए-मजीद ने खाई शहा तिरे शहर ओ कलाम ओ बक़ा की क़सम
क़ाल अल्लाह तआला: ला उक्सिमु बिहादल बलद, व अंता हिल्लूम बिहादल बलद (मतलब: मुझे इस शहर-ए-मक्का की क़सम है इस लिए कि ऐ महबूब तू इस में तशरीफ़ फ़र्मा है।)
क़ाल अल्लाह तआला: व क़ीलिही या रब्बी इन्नहा'उला-इ क़वमुल ला यु'मिनून (मतलब: मुझे रसूल के कहने की क़सम है कि ऐ मेरे रब ये लोग ईमान नहीं लाते।)
क़ाल अल्लाह तआला: ल'अमरुक इन्नहुम लफ़ी सक्रतिहिम य'महून (मतलब: ऐ महबूब मुझे तिरी जान की क़सम कि ये काफ़िर अपने नशे में अंधे हो रहे हैं।)
तिरा मसनद-ए-नाज़ है अर्श-ए-बरीं तिरा महरम-ए-राज़ है रूह-ए-अमीन
तू ही सरवर-ए-हर दो जहां है शहा तिरा मिस्ल नहीं है ख़ुदा की क़सम
यही अर्ज़ है ख़ालिक़-ए-अर्ज़ ओ समा वो रसूल हैं तिरे मैं बंदा तिरा
मुझे उन के जवार में दे वो जगह कि है ख़ुल्द को जिस की सफ़ा की क़सम
तू ही बंदों पे लुत्फ़ ओ अता है तुझी पे भरोसा तुझी से दुआ
मुझे जलवा-ए-पाक-ए-रसूल दिखा तुझे अपने ही इज़्ज़ ओ अला की क़सम
मेरे गरचह गुनाह हैं हद से सिवा मगर उन से उम्मीद है तुझ से रजा
तू रहीम है उन का करम है गवाह वो करीम हैं तिरी अता की क़सम
यही कहती है बुलबुल-ए-बाग़-ए-जनां कि रज़ा की तरह कोई सहर बयां
नहीं हिन्द में वासिफ़-ए-शाह-ए-हुदा मुझे शोख़ी-ए-तब्-ए-रज़ा की क़सम