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Hain saf-aara sab hoor-o-malak aur ghulaman-e-khuld sajate hain

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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हैं सफ़ आरा सब हूर-ओ-मलक और ग़ुलामाँ-ए-ख़ुल्द सजाते हैं इक धूम है अर्श-ए-आज़म पर मेहमान-ए-ख़ुदा के आते हैं है आज फ़लक रौशन रौशन, हैं तारे भी जगमग जगमग महबूब-ए-ख़ुदा के आते हैं, महबूब-ए-ख़ुदा के आते हैं क़ुर्बान मैं शान-ओ-अज़मत पर सोये हैं चैन से बिस्तर पर जिब्रील-ए-अमीन हाज़िर हो कर मेराज का मुज़दा सुनाते हैं जिब्रील-ए-अमीन बु़राक़ लिए जन्नत से ज़मीं पर आ पहुँचे बारात फ़रिश्तों की आई मेराज को दुल्हा जाते हैं है ख़ुल्द का जोड़ा जेब-ए-बदन रहमत का सजा सेहरा सर पर क्या ख़ूब सुहाना है मंज़र मेराज को दुल्हा जाते हैं है ख़ूब फ़ज़ा महकी महकी चलती है हवा ठंडी ठंडी हर सम्त है नूरानी मेराज को दुल्हा जाते हैं ये इज़्ज़-ओ-जलाल अल्लाह! अल्लाह! ये औज-ओ-कमाल अल्लाह! अल्लाह! ये हुस्न-ओ-जमाल अल्लाह! अल्लाह! मेराज को दुल्हा जाते हैं दीवानो! तसव्वुर में देखो! असरा के दुल्हा का जलवा झुरमट में मलाइक लेकर उन्हें मेराज का दुल्हा बनाते हैं अक़्सा में सवारी जब पहुँची जिब्रील ने बढ़ के कही तकबीर नबियों की इमामत अब बढ़ कर सुल्तान-ए-जहाँ फ़रमाते हैं वो कैसा हसीं मंज़र होगा जब दूल्हा बना सरवर होगा उश्शाक़ थोड़कर के बस रोते ही रह जाते हैं ये शाह ने पाई सआदत है ख़ालिक़ ने अता की ज़ियारत है जब एक तजल्ली पड़ती है मूसा तो ग़श खा जाते हैं जिब्राईल ठहर कर सिदरा पर बोले जो बढ़े हम एक क़दम जल जाएंगे सारे बाल-ओ-पर अब हम तो यहीं रह जाते हैं अल्लाह की रहमत से सरवर पहुंचे दना की मंज़िल पर अल्लाह का जलवा भी देखा दीदार की लज़्ज़त पाते हैं मेराज की शब तो याद रखा फिर हश्र में कैसे भूलेंगे अत्तार इसी उम्मीद पे हम दिन अपने गुज़ारे जाते हैं