हाजियों के बन रहे हैं क़ाफ़िले फिर या नबी, फिर नज़र में फिर गए हज्ज के मनाज़िर या नबी।
कर रहे हैं जाने वाले हज्ज की अब तैयारियाँ, रह न जाऊँ मैं कहीं कर दो करम फिर या नबी।
आह! पल्ले ज़र नहीं रखते सफ़र सरवर नहीं, तुम बुला लो तुम बुलाने पर हो क़ादिर या नबी।
किस क़द्र था खुश मुझे जब पेश आया था सफ़र, मुझ को अब की बार भी बुलवाइये फिर या नबी।
दिल मेरा ग़मगीन है और जान भी है मुज़्तरिब, मुर्शिदी का वास्ता बुलवाइये फिर या नबी।
ग़म के बादल छा रहे हैं आह! मेरे क़ल्ब पर, हाज़िरी की दो इजाज़त मुझ को तुम फिर या नबी।
गुम्बदे ख़ज़रा के जलवे देखने कब आऊँगा, कब तक अब तड़पाओगे तुम मुझ को आख़िर या नबी।
आप ही असबाब आका फिर मुहय्या कीजिये, फिर दिखा दीजिये मदीने के मनाज़िर या नबी।
किस तरह तस्कीन दूँ गा मैं दिले ग़मगीन को, रह गया गर हाज़िरी से मैं जो क़ासिर या नबी।
मुझ पे क्या गुज़रे गी आका! इस बरस गर रह गया, मेरा हाले दिल तो है सब तुम पे ज़ाहिर या नबी।
आह! तैय्यबा से अगर मैं दूर रह कर मर गया, रूह भी रंजूर होगी किस क़द्र फिर या नबी।
मिस्ले साबिक़ इस बरस भी कीजिये नज़रे करम, मैं गुज़श्ता साल आया था बिल-आख़िर या नबी।
जो मदीने के लिए रहते हैं आका बे-क़रार, वो भी हो जाएँ तेरे रौज़े पे हाज़िर या नबी।
चाक सीना चाक दिल सोज़े जिगर और चश्मे तर, दीजिये मुझ को तुफ़ैले अब्दे क़ादिर या नबी।
यक़ीन क़ुरआन अज़मत पर तुम्हारी है गवाह, शाहिद-ओ-क़ासिम हो तुम तैय्यब हो ताहिर या नबी।
तुम को इल्म-ए-ग़ैब मौला ने अता फ़रमाया
कर दिया हर जा पे हाज़िर और नाज़िर या नबी!
इस्तिक़ामत दीन पर मुझ को अता फ़रमाइये
या रसूल अल्लाह बराए आल-ए-यासर! या नबी!
आप सब नबियों में अफ़ज़ल और मैं बदकार आह!
आसियों में हूँ यगाना और नादिर या नबी!
आसी ओ बदकार के अपने ख़ुदा-ए-पाक से
बख़्शवा दो सब स ग़ाएर और कबाएर या नबी!
बाल भी बीका न मेरा तो कोई कर पायेगा
क्यों के मेरे तुम हो हामी और नासिर या नबी!
तिश्नागान-ए-दीद को हो दीद का शरबत अता
अज़ तुफ़ैल-ए-ग़ौस-ए-आज़म अब्दुल क़ादिर या नबी!
आह! मेरा क्या बनेगा गर न हज पर जा सका
हो करम अत्तार पर हो जाये हाज़िर या नबी!