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Hajj Ka Sharaf Ho Phir Ata Ya Rabb-e-Mustafa

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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हज का शरफ़ हो फिर अता या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा मीठे मदीना फिर दिखा या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा मिल जाए अब रिहाई फ़िराक़-ए-मदीना से हो यह करम, हो यह अता या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा देदे तवाफ़-ए-ख़ाना-ए-काबा का फिर शरफ़ फ़रमा यह पूरा मिरा दुआ या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा रुख़ सू-ए-काबा हाथ में ज़म ज़म का जाम हो पी कर मैं फिर करूँ दुआ या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा फिर क़ाफ़िला इलाही बने "चल मदीना" का अहमद रज़ा का वास्ता या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा सब अहल-ए-ख़ाना साथ में हों काश! चल पड़े सू-ए-मदीना क़ाफ़िला या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा हों साथ में नवासियां और उन के वालिदैन चल दे मदीने क़ाफ़िला या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा हों साथ पोते पोतियां और उन के वालिदैन चल दे मदीने क़ाफ़िला या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा दीवाने मुस्तफ़ा के मेरे साथ साथ हों चल दे मदीने क़ाफ़िला या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा रोती रहे जो हर घड़ी इश्क़-ए-रसूल में वह आँख देदे या ख़ुदा या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा ऐ काश! मुझ को ख़्वाब में हो जाए एक बार दीदार-ए-शाह-ए-अंबिया या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा हों ख़त्म मेरे मुल्क से तख़रीब-कारियां अमन-ओ-अमान हो अता या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा दुनिया के झगड़े ख़त्म हों और मुश्किलें टलें सदक़ा हसन हुसैन का या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा गो जान को ख़तरा है मेरी इमदाद पर है तू फिर दुश्मनों का ख़ौफ़ क्या या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा इस तरह फैले नेकी की दावत कि नेक हो हर एक छोटा और बड़ा या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा बे-पर्दगी का ख़ात्मा हो औरतों को दे ज़ेवर-ए-हया-ओ-शर्म का या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा हर माह-ए-मदनी क़ाफ़िले में सब करें सफ़र अल्लाह! जज़्बा कर अता या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा अहकाम-ए-शरअ पर मुझे देदे अमल का शौक़ पैकर-ए-ख़ुलूस का बना या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा "क़ुफ़्ल-ए-मदीना" लब पे हो और यह शरफ़ मिले हर दम करूँ तिरी सना या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा हो जाएं मौला मस्जिदें आबाद सब की सब सब को नमाज़ी दे बना या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा ग़ीबत से और तोहमत-ओ-चुगली से दूर रख ख़ूगर तू सच का दे बना या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा उज़ब-ओ-तकब्बुर और बचा हुब्ब-ए-जाह से आए न पास तक रिया या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा अमराज़-ए-इसयां ने मुझे कुरनीम जान दिया मुर्शिद का सदक़ा दे शफ़ा या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा जूं ही गुनाह करने लगूँ, तेरे ख़ौफ़ से फ़ौरन उठूँ मैं थरथरा या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा तिरी ख़शियत और तेरे डर से, ख़ौफ़ से हर दम हो दिल यह कांपता या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा दे नज़अ-ओ-क़ब्र-ओ-हश्र में हर जा अमान, और दोज़ख़ की आग से बचाया या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा आँखों में जलवा-ए-शाह का और लब पे नात हो जब रूह तन से हो जुदा या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा ऐ काश! ज़ैर-ए-गुम्बद-ए-खज़रा पए ज़िया ईमान पर ख़ात्मा हो या रब-ए-मुस्तफ़ा मुझ को बक़ी-ए-पाक में मदफ़न नसीब हो ग़ौस-उल-वरा का वास्ता या रब-ए-मुस्तफ़ा जिस दम वो आएं क़ब्र में, मेरी ज़बान पर बस मरहबा की हो सदा या रब-ए-मुस्तफ़ा हश्र में पुल-ए-सिरात पे मेरे क़दम कहीं जाएं फ़िसल न या ख़ुदा या रब-ए-मुस्तफ़ा फ़िरदौस में पड़ोस दे अपने हबीब का मौला अली का वास्ता या रब-ए-मुस्तफ़ा तू बे-हिसाब बख़्श दे अत्तार-ए-ज़ार को तुझ को नबी का वास्ता या रब-ए-मुस्तफ़ा