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हमारे दिल के आईने में है नक़्श-ए-मुहम्मद का

Written by Maulana Muhammad Jamil-ur-Rehman Razvi

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हमारे दिल के आईने में है नक़्श-ए-मुहम्मद का हमारी आँख की पुतली में है जलवा मुहम्मद का ख़स-ओ-ख़ाशाक से बदतर है बेगाना मुहम्मद का उसे होशियार समझो जो है दीवाना मुहम्मद का तुम्हारे ही लिए था ऐ गुनहगारो सियाह कारो वह शब भर जागना और रात भर रोना मुहम्मद का जिगर होता है टुकड़े-टुकड़े जिस दम याद आता है वह शब भर जागना और रात भर रोना मुहम्मद का गुलामान-ए-मुहम्मद के सरों से बार-ए-इसियाँ को उड़ा ले जाएगा इक आन में झोंका मुहम्मद का सियाह हैं नामा-ए-आमाल अपने गरचा ऐ ज़ाहिद मगर काफ़ी है धुलने के लिए छींटा मुहम्मद का