हमारे दिल के आईने में है नक़्श-ए-मुहम्मद का
हमारी आँख की पुतली में है जलवा मुहम्मद का
ख़स-ओ-ख़ाशाक से बदतर है बेगाना मुहम्मद का
उसे होशियार समझो जो है दीवाना मुहम्मद का
तुम्हारे ही लिए था ऐ गुनहगारो सियाह कारो
वह शब भर जागना और रात भर रोना मुहम्मद का
जिगर होता है टुकड़े-टुकड़े जिस दम याद आता है
वह शब भर जागना और रात भर रोना मुहम्मद का
गुलामान-ए-मुहम्मद के सरों से बार-ए-इसियाँ को
उड़ा ले जाएगा इक आन में झोंका मुहम्मद का
सियाह हैं नामा-ए-आमाल अपने गरचा ऐ ज़ाहिद
मगर काफ़ी है धुलने के लिए छींटा मुहम्मद का