हमारे हाले दिल से तुम तो वाक़िफ़ ख़ुदावंदे-दो आलम की क़सम हो
अंधेरा लहद में है आह! छाया मेरे नूरे-ख़ुदा चश्मे-करम हो
इसे क्या ख़ौफ़े-महशर हो कि जिस का तेरे दस्ते-शफ़ाअत में भरम हो
मिटा सकता नहीं कोई भी इस को कि हामी जिस का ख़ुद शाहे-उमम हो
ग़मे-महबूब में रोती रहे जो मुझे या रब अता वो चश्मे-नम हो
शहा जितने भी दीवाने हैं तेरे
किसी का जज़्बा-ए-उल्फ़त न कम हो
जो तुम चाहो यक़ीनन दूर मुझ से
शहा उक़बा का हर रंज-ओ-अलम हो
करे आँखों से सैले-अश्क जारी
अता हिज्रे-मदीना का वो ग़म हो
सदा करता रहूँ सुन्नत की खिदमत
मरा जज़्बा किसी सूरत न कम हो
करें इस्लामी बहनें शरई पर्दा
अता उन को हया शाहे-उमम हो
दिखा दो सब्ज़ गुंबद की बहारें
शहा अत्तार पर अब तो करम हो
मदीना