हर एक गुल में है रंग उन का ज़बान-ए-बुलबुल पे उन का नग़मा
है सब की आँखों में नूर उन का वो सब के दिल में मुक़ीम भी हैं
अता किए हैं लक़ब ख़ुदा ने हमारे आक़ा को कैसे प्यारे
अमीन भी हैं मकीन भी हैं अज़ीज़ भी हैं अज़ीम भी हैं
मैं उन का बंदा वो मेरे मौला वो मेरे मालिक मैं उन का बंदा
ख़ुदा के फ़ज़्ल ओ करम से आक़ा हफ़ीज़ भी हैं करीम भी हैं
उन्हें के सर पर है ताज-ए-इज़्ज़त उन्हें के बाइस है सारी ख़िलक़त
ना क्यों हों मालिक वो अर्श-ए-हक़ के हबीब भी हैं कलीम भी हैं
अफ़ू हो तुम अज़ीज़ हो तुम वकील हो तुम कफ़ील हो तुम
तुम्हारे बंदे हैं हम अगरचे सक़ीम भी हैं असीम भी हैं
जमील रिज़वी को ग़म-ए-अज़ाब-ए-अलीम क्यों हो
मदीने वाले हैं उस के सर पर मदद पे ग़ौस-ए-अज़ीम भी हैं