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हर ख़ता तू दरगुज़र कर बेकस-ओ-मजबूर की

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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हर ख़ता तू दरगुज़र कर बेकस-ओ-मजबूर की, हवा ही मग़फ़िरत हर बेकस-ओ-मजबूर की या इलाही! कर दे पूरी अज़ पये ग़ौस-ओ-रज़ा, आरज़ू-ए-दीद-ए-सरवर बेकस-ओ-मजबूर की ज़िंदगी और मौत की है या इलाही कशमकश, जां चले तेरी रज़ा पर बेकस-ओ-मजबूर की आला इल्लिय्यीन में या रब! उसे देना जगह, रूह चले जब निकल कर बेकस-ओ-मजबूर की हो बक़ी-ए-पाक की अल्लाह! पूरी आरज़ू, अज़ पये हसनैन-ओ-हैदर बेकस-ओ-मजबूर की वास्ता नूर-ए-मुहम्मद का तुझे प्यारे ख़ुदा, गोर-ए-तीरा कर मुनव्वर बेकस-ओ-मजबूर की आप के बैठे मदीने में पये ग़ौस-ओ-रज़ा, हाज़िरी हो या नबी! हर बेकस-ओ-मजबूर की आमना के लाल! सदक़ा फ़ातिमा के लाल का, दूर शाम-ए-रंज-ओ-ग़म कर बेकस-ओ-मजबूर की नफ़्स-ओ-शैतां ग़ालिब आएं लो ख़बर अब जल्द तर, या रसूल अल्लाह! आकर बेकस-ओ-मजबूर की कहते रहते हैं दुआ के वास्ते बंदे तेरे, कर दे पूरी आरज़ू हर बेकस-ओ-मजबूर की जिस किसी ने भी दुआ के वास्ते या रब! कहा, ऐ हबीब-ए-रब-ए-दावर! बेकस-ओ-मजबूर की बहर-ए-ख़ाक-ए-करबला हूं दूर आफ़त-ओ-बला, ऐ हबीब-ए-रब-ए-दावर बेकस-ओ-मजबूर की आप ख़ुद तशरीफ़ लाएं बेकस की तरफ़, आह! जब निकली तड़प कर बेकस-ओ-मजबूर की ऐ मदीने के मुसाफ़िर! तू वहां ग़म की घटा, उन से कहना ख़ूब रो कर बेकस-ओ-मजबूर की होक उठी, रूह तड़पी, जब मदीना फट गया, जान थी ग़मगीन-ओ-मुज़्तर बेकस-ओ-मजबूर की आप के क़दमों में गिर कर मौत की या मुस्तफ़ा, आरज़ू कब आएगी बर, बेकस-ओ-मजबूर की नामा-ए-अत्तार में हुस्न-ए-अमल कोई नहीं, लाज रखना रोज़-ए-महशर बेकस-ओ-मजबूर की