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हवा है जलवा-नुमा वह निगार आँखों में

Written by Maulana Muhammad Jamil-ur-Rehman Razvi

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हवा है जलवा-नुमा वह निगार आँखों में कि आज फूल रही है बहार आँखों में नक़ाब उठ गया क्या क्या रू-ए-माह-ए-तैयबा से कि शश जहत से है नूर आशकार आँखों में नज़र में ऐसा समाया है गुलशन-ए-तैयबा खिला हुआ है अजब लाला-ज़ार आँखों में उरूज पर हो हमारा सितारा-ए-क़िस्मत बने तुम्हारा अगर रह-गुज़र आँखों में तुम्हारे आरिज़-ए-पुर-नूर देखने के लिए है जान-ए-ज़ार बहुत बे-क़रार आँखों में