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Hawa jaata hai rukhsat maah-e-Ramzan Ya RasoolAllah

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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हवा जाता है रुख़सत माहे-रमज़ान या रसूल अल्लाह, रहा अब चंद घड़ीयों का यह मेहमां या रसूल अल्लाह ख़ुशी की लहर दौड़ी हर तरफ़ रमज़ान जब आया, हैं अब रंजीदा रंजीदा मुसलमां या रसूल अल्लाह मुसर्रत ही मुसर्रत और ख़ुशी ही थी ख़ुशी जिस दम, नज़र आया हिलाले-माहे-रमज़ान या रसूल अल्लाह शहा! अब ग़म के मारे ख़ून के आँसू बहाते हैं, चला तड़पा के हाये माहे-रमज़ान या रसूल अल्लाह चला अब जल्द यह रमज़ान सत्ताईस आ गई तारीख़, फ़क़त दो दिन का अब रमज़ान है मेहमां या रसूल अल्लाह फ़ज़ाएं नूर बरसाएं हवाएं मुस्कुराती थीं, समां अब हो गया हर सम्त वीरां या रसूल अल्लाह रियाज़त कुछ न की हम ने इबादत कुछ न की हम ने, रहे बस हर घड़ी मशग़ूले-इसयां या रसूल अल्लाह मैं हाये जी चुराता ही रहा रब की इबादत से, गुज़ारा ग़फ़लतों में सारा रमज़ान या रसूल अल्लाह मैं सोता रह गया ग़फ़लत की चादर तान कर अफ़सोस, ख़ुदा रा मेरी बख़्शिश का हो सामां या रसूल अल्लाह जुदाई की घड़ी जां सोज़ है उश्शाक़े-रमज़ान पर, चला इन को लुटा कर माहे-रमज़ान या रसूल अल्लाह तड़पते हैं बिलकते हैं क़रार आता नहीं उन को, बहुत बे-चैन हैं उश्शाक़े-रमज़ान या रसूल अल्लाह गुनाहों की सियाही छा रही है रुख़ पे महशर में, मरा चेहरा पे रमज़ान हो ताबां या रसूल अल्लाह यह रमज़ान की रुख़सत जाने-आशिक़ पर क़यामत है, गदा तेरे हैं हैरानो-परेशां या रसूल अल्लाह ख़ुदा के नेक बंदे नेकियों में लग गए लेकिन, गुनाह करता रहा अत्तार नादां या रसूल अल्लाह