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हुब्ब-ए-दुनिया से तू बचा या रब!

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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हुब्ब-ए-दुनिया से तू बचा या रब आशिक़-ए-मुस्तफ़ा बना या रब कर दे हज का शरफ़ अता या रब सब्ज़ गुम्बद भी दिखा या रब है तेरी ही इनायत-ओ-रहमत मुझको मक्के बुला लिया या रब आज है रूबरू मेरे का'बा सिलसिला है तवाफ़ का या रब अबर बरसा दे नूर का मैं लूँ बारिश-ए-नूर में नहा या रब काश लब पर मेरे रहे जारी ज़िक्र आठों पहर तेरा या रब चश्म-ए-तर और क़ल्ब-ए-मुज़्तर दे अपनी उल्फ़त की मय पिला या रब आह! तुग़यानियां गुनाहों की पार नैया मेरी लगा या रब नफ़्स-ओ-शैतां हो गए ग़ालिब इन के चुंगल से तू छुड़ा या रब कर के तौबा मैं फिर गुनाहों में हो ही जाता हूँ मुब्तला या रब नीम जां कर दिया गुनाहों ने मरज़-ए-इसयां से दे शफ़ा या रब