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इज़्न मिल जाए गर मदीने का

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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इज़्न मिल जाए गर मदीने का काम बन जाए गा कमीने का जा के उन को दिखाऊं गा मैं तो ज़ख़्म-ए-दिल और दाग़ सीने का क़ल्ब-ए-आशिक़ उठा धड़क एक दम ज़िक्र जब छिड़ गया मदीने का आंख से अश्क हो गए जारी जब चला क़ाफ़िला मदीने का उस की क़िस्मत पे रश्क आता है जो मुसाफ़िर हुआ मदीने का तुझ पे रहमत हो ज़ाएर-ए-तैयबा! जा, निगहबां ख़ुदा सफ़ीने का हम को भी बुलाएं गे एक दिन इज़्न मिल जाए गा मदीने का हो ग़म-ए-मुस्तफ़ा अता यारब! दर्द बढ़ता रहे मदीने का नज़्अ में, क़ब्र में, क़यामत में तुम ही रखना भरम कमीने का दूर रंज-ओ-अलम हों दुनिया के हम को मिल जाए ग़म मदीने का लुत्फ़ से है तेरे भरम वरना काम कोई नहीं क़रीने का एक मुद्दत से दिल में अरमां है यानी! जाम-ए-दीद पीने का मौत गर आए तेरे क़दमों में लुत्फ़ आ जाए फिर तो जीने का अपने अत्तार पर करम कर दो सग बना लो उसे मदीने का