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जांकनी का वक़्त है या मुस्तफ़ा

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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जांकनी का वक़्त है या मुस्तफ़ा जां-लब अब तालिब-ए-दीदार है आप के क़दमों में गिर कर मौत की आरज़ू या सय्यद-ए-अबरार है मग़फ़िरत फ़र्मा तुफ़ैल-ए-मुर्शिदी यह दुआ तुझ से मरे ग़फ़्फ़ार है बुलबुल-ओ! तुम को मुबारक फूल हो बस गया तैयबा का दिल में ख़ार है क्या करूं मैं देख कर रंग-ए-चमन दश्त-ए-तैयबा से मुझे तो प्यार है सब्ज़ गुम्बद की ज़ियाएं मरहबा मरहबा पुरनूर हर मीनार है जगमगाता है मदीना रात दिन सब्ज़ गुम्बद मन्बअ-ए-अनवार है जिस की तुर्बत है बक़ी-ए-पाक में उस को हासिल क़ुर्बत-ए-सरकार है मुस्तफ़ा इस रोज़ आये इस लिये ईद-ए-मीलादुननबी से प्यार है मरहबा! आक़ा की आमद मरहबा! हम को इस नारे से बेहद प्यार है जो कोई गुस्ताख़ है सरकार का वो हमेशा के लिये फ़िन-नार है दुश्मनों का तंग घेरा हो गया रहम की दरख़्वास्त अब सरकार है आह! दुश्मन का प्यासा हुआ या नबी! तेरी मदद दरकार है हासदों को दे हिदायत या ख़ुदा उस का सदक़ा जो मरा ग़मख़्वार है ग़ौस के दामन में अत्तार आ गया दो जहां में इस का बेड़ा पार है