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जब हश्र में कोई भी करेगा न सिफ़ारिश

Written by Maulana Muhammad Jamil-ur-Rehman Razvi

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जब हश्र में कोई भी करेगा न सिफ़ारिश घबराए हुए आएंगे सब सू-ए-मुहम्मद सब मुंतज़िर-ए-रहमत-ए-मबूद हैं लेकिन है दावर-ए-महशर की नज़र सू-ए-मुहम्मद उन पर न पड़ें किस लिए आलम की निगाहें है दावर-ए-महशर की नज़र सू-ए-मुहम्मद बरसे गी शफ़ाअत की भरन उम्मत-ए-शाह पर जिस वक़्त खुलें हश्र में गेसू-ए-मुहम्मद मरजाऊं मदीने के बयाबां में इलाही हो नअश मेरी और सग-ए-कू-ए-मुहम्मद तारीकी-ए-मरक़द से जो घबराए दिल-ए-ज़ार पुरनूर बनाएं इसे गेसू-ए-मुहम्मद जन्नत तो मनाए गी चलो मेरी तरफ़ को और मैं ये कहूं गा कि नहीं सू-ए-मुहम्मद तब जान में जान आए जमील-ए-रिज़वी के सग-ए-अपना बनाएं जो सग-ए-कू-ए-मुहम्मद