जहेज़

Written by Mufti Ahmad Yar Khan Naeemi

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फ़ातिमा ज़हरा का जिस दिन अक़द था सुन लो उन के साथ क्या नक़द था एक चादर सत्तरहवां पैवंद की मुस्तफ़ा ने अपनी दुख़्तर को जो दी एक तोशक जिस का चमड़े का ग़िलाफ़ एक तकिया एक ऐसा ही लिहाफ़ जिस के अंदर ऊन न रेशम न रुई बल्कि इस में छाल खुर की भरी एक चक्की पीने के वास्ते एक मशकीज़ा था पानी के लिए एक लकड़ी का प्याला साथ में नुक़रई कंगन की जोड़ी हाथ में और गले में हार हाथी दांत का एक जोड़ा भी खड़ाऊं का दिया शाह ज़ादी सय्यद-उल-कौनैन की बे सवारी ही अली के घर गई वास्ते जिन के बने दोनों जहां उन के घर थीं सीधी सादी शादियां इस जहेज़-ए-पाक पर लाखों सलाम साहिब-ए-लौलाक पर लाखों सलाम