जिन का लक़ब है मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम
उन से हमें मिला सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम
रूह-ुल-अमीन तो थक गए और वो अर्श तक गए
अर्श-ए-बरीं पुकार उठा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम
खुल्द-ए-बरीं में हर जगह नाम-ए-शाह-ए-अनाम है
खुल्द है मुल्क आप का सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम
धूम है उन की चार सू ज़िक्र है उन का को-ब-को
मज़हर-ए-ज़ात-ए-किबरिया सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम
जो हो मरीज़-ए-ला-दवा या किसी ग़म में मुब्तला
सुबह-ओ-मसा पढ़े सदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम
मुश्किलें उनकी हल हुईं किस्मतें उनकी खुल गईं
विर्द जिन्होंने कर लिया सल्ल-ए-अला मुहम्मद
शिद्दत-ए-जान-कनी हो जब हो कशमकश
विर्द-ए-ज़बाँ हो या ख़ुदा सल्ल-ए-अला मुहम्मद
क़ब्र में जब फ़रिश्ते आएं शक्ल-ए-ख़ुदा-नुमा दिखाएं
पढ़ता उठूँ मैं या ख़ुदा सल्ल-ए-अला मुहम्मद
लाज गुनहगार की आप के हाथ में है नबी
बद है मगर है आप का सल्ल-ए-अला मुहम्मद
हश्र में सालिक-ए-हज़ीं थाम के दामन-ए-नबी
अर्ज़ करे ये बर-मला सल्ल-ए-अला मुहम्मद