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जितना मेरे खुदा को है मेरा नबी अज़ीज़

Written by Allama Hasan Raza Khan

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जितना मेरे खुदा को है मेरा नबी अज़ीज़ कौनैन में किसी को न होगा कोई अज़ीज़ ख़ाके मदीना पर मुझे अल्लाह मौत दे वह मुर्दा दिल है जिस को न हो ज़िंदगी अज़ीज़ क्यों जाएं हम कहें कि ग़नी तुम ने कर दिया अब तो यह घर पसंद यह दर यह गली अज़ीज़ जो कुछ तेरी रज़ा है खुदा की वही ख़ुशी जो कुछ तेरी ख़ुशी है खुदा को वही अज़ीज़ गो हम नमक हराम निकले ग़ुलाम हैं क़ुरबान फिर भी रखती है रहमत तेरी अज़ीज़ शाने करम को अच्छे बुरे से ग़रज़ नहीं उस को सभी पसंद हैं उस को सभी अज़ीज़ मंगता का हाथ उठा तो मदीना ही की तरफ तेरा ही दर पसंद तेरी ही गली अज़ीज़ इस दर की ख़ाक पर मुझे मरना पसंद है तख्ते शाही पे किस को नहीं ज़िंदगी अज़ीज़ कौनैन दे दिए हैं तेरे इख़्तियार में अल्लाह को भी कितनी है ख़ातिर तेरी अज़ीज़ महशर में दो जहां को खुदा की ख़ुशी की चाह मेरे हुज़ूर की है खुदा को ख़ुशी अज़ीज़ क़ुरआन खा रहा है इसी ख़ाक की क़सम हम कौन हैं खुदा को है तेरी गली अज़ीज़ तैबा की ख़ाक हो कि हयाते अबद मिले ऐ जां बलब तुझे है अगर ज़िंदगी अज़ीज़ संगे सितम के बाद दुआए फ़लाह की बंदे तो बंदे हैं तुम्हें हैं मुद्दई अज़ीज़ दिल से ज़रा यह कह दे कि उन का ग़ुलाम हूं हर दुशमने खुदा हो खुदा को अभी अज़ीज़ तैबा के होते खुल्दे बरीं क्या करूं हसन मुझ को यही पसंद है मुझ को यही अज़ीज़ इलाही दे मरे दिल को ग़म-ए-इश्क़ निशाते-दहर से हो जाऊँ नाख़ुश नहीं जातीं कभी दश्त-ए-नबी से कुछ ऐसी है बहारों की फ़ज़ा ख़ुश मदीने की अगर सरहद नज़र आए दिल-ए-नाशाद हो बे-इंतहा ख़ुश न ले आराम दम भर बे-ग़म-ए-इश्क़ दिल-ए-मुज़्तर में ख़ुश मेरा ख़ुदा ख़ुश न था मुमकिन कि ऐसी मासीयत पर गुनाहगारों से हो जाता ख़ुदा ख़ुश तुम्हारी रोती आँखों ने हंसाया तुम्हारे ग़मज़दा दिल ने किया ख़ुश इलाही धूप हो उन की गली की मरे सर को नहीं ज़िल्ले-हुमा ख़ुश हसन ना'त-ओ-चुनीं शीरीं बयानी तू ख़ुश बाशी कि کردی वक़्ते-मा ख़ुश