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Jo Bhi Sarkar Ka Ashiq-e-Zar Hai Us Ki Thokar Pe Daulat Ka Anbar Hai

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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जो भी सरकार का आशिक़-ए-ज़ार है उस की ठोकर पे दौलत का अंबार है सल्तनत से उसे क्या सरोकार है वास्ते इक़्तिदार उस के बेकार है जो कि दीवाना शाह-ए-अबरार है जिस का दिल उन की उल्फ़त से सरशार है उन की सुन्नत का जो आईना दार है बस वही तो जहाँ में समझदार है आतिश-ए-शौक़ में काश! जलता रहूँ और ख़याल-ए-मदीना में खोया रहूँ बस मदीना मदीना ही करता रहूँ ये दुआ मेरी ऐ रब-ए-ग़फ़्फ़ार है दूर दुनिया के होजाएँ रंज-ओ-अलम मुझ को मिल जाए बैठे मदीने का ग़म हो करम हो या ख़ुदा हो करम वास्ता उस का जो शाह-ए-अबरार है आह! असियाँ के तूफ़ाँ में जाँ चमन फँस गया है सफीना ऐ शाह-ए-ज़मन बस तुम्हें एक उम्मीद की हो किरन तुम जो चाहो तो बेड़ा मरा पार है रो रहा है ये जो हिचकियाँ बाँध कर याद आया है उस को नबी का नगर क्या करो गे तबीबो! उसे देख कर छोड़ दो ये मदीने का बीमार है बैठे बैठे मदीने की महकी फ़ज़ा हर मुस्लमाँ को या इलाही! दिखा उस शह-ए-कर्बला का तुझे वास्ता जो जवानान-ए-जन्नत का सरदार है आह! रंज-ओ-अलम की नहीं कोई हद काम करती नहीं अब तो अक़्ल-ओ-ख़िरद अलमदद ए मेरे रहनुमा अलमदद पाओं ज़ख़्मी हैं और राह पुर-ख़ार है मुझ को सोज़-ए-बिलाल और सोज़-ए-रज़ा दे दो सोज़-ए-ओवैस और सोज़-ए-ज़िया वास्ता तुझ को आक़ा उसी ग़ौस का औलिया का जो सुल्तान-ओ-सरदार है भर के जाते हैं मांगते जहां झोलियां भूल जाते हैं ग़म ग़म के मारे जहां जिस जगह दुश्मनों ने भी पाई अमां मेरे बैठे नबी का वो दरबार है वो हबीब-ए-ख़ुदा सरवर-ए-इन्स-ओ-जां जिस के ज़ेर-ए-तसर्रफ़ हैं दोनों जहां उस पे क़ुर्बान दिल उस पे क़ुर्बान जां जो ख़ुदा की ख़ुदाई का मुख़्तार है ए मुक़द्दर की रूठी हवाओ सुनो! हाल-ए-दिल पर ना यूं मुस्कुराओ सुनो! आंधियो! गर्दिशो! तुम भी आओ सुनो! मुस्तफ़ा मेरा हामी-ओ-ग़मख़्वार है टूटे गो सर पे कोह-ए-बला सब्र कर ए मुबल्लिग़ ना तू डगमगा सब्र कर लब पे हर्फ़-ए-शिकायत ना ला सब्र कर हां यही सुन्नत-ए-शाह-ए-अबरार है या हबीब-ए-ख़ुदा मुझ पे चश्म-ए-अता कर दो तुम अज़ पये ग़ौस-ओ-अहमद रज़ा ले कर उम्मीद-ए-अफ़्व-ओ-करम सरवर-ए-दर पे हाज़िर तुम्हारा गुनहगार है ख्वाह दौलत ना दे कोई सरवत ना दे चाहे इज़्ज़त ना दे कोई शोहरत ना दे तख़्त-ए-शाही ना दे और हुकूमत ना दे तुझ से अत्तार तेरा तलबगार है