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जो हो सर को रसाई उन के दर तक

Written by Allama Hasan Raza Khan

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जो हो सर को रसाई उन के दर तक तो पहुँचे ताज-ए-इज़्ज़त अपने सर तक वह जब तशरीफ़ लाए घर से दर तक भिकारी का भरा है दर से घर तक दुहाई नाखुदा-ए-बे-कसों की के सैलाब-ए-अलम पहुँचा कमर तक इलाही दिल को दे वह सोज़-ए-उल्फ़त फनके सीना जलन पहुँचे जिगर तक ना हो जब तक तुम्हारा नाम शामिल दुआएं जा नहीं सकतीं असर तक गुज़र की राह निकली रह-गुज़र में अभी पहुँचे ना थे हम उन के दर तक खुदायों उन की उल्फ़त में गुमा दे ना पाऊँ फिर कभी अपनी ख़बर तक बजाए चश्म-ए-खुद उठ ता ना हो आओ जमाल-ए-यार से तेरी नज़र तक तेरी नेमत के भूके अहल-ए-दौलत तेरी रहमत का प्यासा अबर तक ना होगा दो क़दम का फ़ासला भी अल्लाहबाद से अहमद नगर तक तुम्हारे हुस्न के बाड़े के सदक़े नमक ख्वार-ए-मलाहत है क़मर तक शब-ए-मेराज थे जलवे पे जलवे शबिस्तान-ए-दुना से उन के घर तक बला-ए-जान है अब वीरानी-ए-दिल चले आओ कभी इस उजड़े घर तक ना खोल आँखें निगाह-ए-शौक़-ए-नाकिस बहुत पर्दे हैं हुस्न-ए-जल्वा-गर तक जहन्नम में धकेलें नज्दियों को हसन झूठों को यूँ पहुँचाएं घर तक दिल कशी हुस्न-ए-जानां का हो क्या आलम बयां दिल फ़दाए आइना आइना क़ुर्बान-ए-जमाल पेश-ए-यूसुफ़ हाथ काटे हैं ज़नान-ए-मिस्र ने तेरी ख़ातिर सर कटा बैठे फ़दायान-ए-जमाल तेरे ज़र्रे पर शब-ए-ग़म की जफ़ाएं ता-ब-के नूर का तड़का दिखा ए मेहर-ए-ताबान जमाल इतनी मुद्दत तक हो दीद-ए-मुसहफ़-ए-आरिज़ नसीब हिफ़्ज़ कर लूं नाज़िरा पढ़ पढ़ के क़ुरआन-ए-जमाल या ख़ुदा दिल की गली से कौन गुज़रा है आज ज़र्रा ज़र्रा से है ताले-ए-मेहर-ए-ताबान जमाल उन के दर पर इस क़दर बंटा है बाड़ा नूर का झोलियां भर भर के लाते हैं गदायान-ए-जमाल नूर की बारिश हुस्न पर हो तेरे दीदार से दिल से धुल जाए इलाही दाग़-ए-हरमान-ए-जमाल