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Jo Kasa-e-Taj Kale Tumhare Dar Par Aaye

Written by Mustafa Raza Khan Qadri

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जो कासा-ए-ताज काले तुम्हारे दर पर आए तो बादशाह-ए-हक़ीक़त में ताजवर हो जाए तेरे गदाओं की पापोश-ए-ताज-ए-सुल्ताँ है वो जिस के सर पे रखें नल ताजवर हो जाए जो आप हों मेरे पल्ले पे फिर मुझे क्या डर जिधर निगाह-ए-करम हो ख़ुदा इधर हो जाए जो ख़्वाब में कभी तशरीफ़ लाएं जान-ए-क़मर तो उन के नूर से मअमूर सारा घर हो जाए ख़ुदा ने क़ल्ब-ए-हक़ीक़त तुम्हारे हाथ किया जो शाख-ए-लड़ने को दो तेग़ और तब्र हो जाए जो वक़्त-ए-वज़्न-ए-ग़रां पल्ला हो गुनाहों का शफ़ाअत आप की उस दम मेरी सिपर हो जाए अँधेरी शब में करम से तुम्हारे ऐ सरवर असा-ए-सहाबा का फ़ानूस रहबर हो जाए ख़ुदा ने ग़ैब तुम्हारे लिए हुज़ूर किया जो राज़-ए-दिल में छुपे हों तुम्हें ख़बर हो जाए वो आएं तीरगी हो दूर मेरे घर भर की शब-ए-फ़िराक़ की या रब कभी सहर हो जाए हिजाब उठें जो मरक़द से उनके रौज़े तक अंधेरा क़ब्र का मिट जाए दोपहर हो जाए तेरे हबीब के दुश्मन हैं और ख़ुद तेरे हर एक उन में का फ़िन-नारि व-स-सक़र हो जाए किनार-ए-आतिफ़त-ए-हाविया में एक एक जाए जो मां की गोद में बैठे तो ख़ुश-पिसर हो जाए सरापा आग के दरिया में डूब जाएं ये अगर हमीम का दरिया कमर कमर हो जाए चमक उठे मेरी क़िस्मत का तारा ऐ नूर-ए-आ अगर वो ग़ैरत-ए-ख़ुर्शीद मेरे घर हो जाए