जो सीने को मदीना उन की यादों से बनाते हैं
उही तो ज़िंदगानी का हक़ीक़ी लुत्फ़ उठाते हैं
जो अपनी ज़िंदगी में सुन्नतें उन की सजाते हैं
इन्हें प्यारा मुहम्मद मुस्तफ़ा अपना बनाते हैं
ग़म-ए-सरवर में रोने का क़रीना या इलाही दे
मुझे अफ़सोस बे-जा ग़म ज़माने के रुलाते हैं
जो दीदार-ए-मुहम्मद की तड़प रखते हैं सीने में
नबी-ए-पाक उन को ख़्वाब में जलवा दिखाते हैं
ज़माना जिस को ठुकरादे, हर एक धुत्कार दे ऐसे
निकम्मे से निकम्मे को भी सीने से लगाते हैं
फ़िदा मैं क्यों न हो जाऊं, नबी की शान-ए-रहमत पर
वो बढ़ कर थाम लेते हैं क़दम जब लड़खड़ाते हैं
जब उन के सामने लाल-ए-आमना मुस्कुराता है
ग़म ओ आलाम के मारे ग़म भूल जाते हैं
बि-इज़्न-ए-अल्लाह सारी नेमतों के हैं वही क़ासिम
हमें आक़ा खिलाते हैं हमें आक़ा पिलाते हैं
मदीना
ऐ सरकार-ए-मदीना, राहत-ए-क़ल्ब-ओ-सीना सल्लल्लाहु तआला अलैहि वा आलीही वसल्लम का फ़रमान-ए-आली शान है:
“इन्नमा अना क़ासिमुंव वल्लाहु यु'ती“ यानी अल्लाह अज़्ज़वजल अता करता है और मैं तक़सीम करता हूं (सहीह बुख़ारी ज 1 स 43 हदीस 71) इस हदीस-ए-पाक के तहत हज़रत-ए-सैय्यदुना मुफ़्ती अहमद यार ख़ान अलैहि रहमतुल हन्नान फ़रमाते हैं कि दीन-ओ-दुनिया की सारी नेमतें इल्म, ईमान, माल, औलाद वग़ैरा देता अल्लाह है बांटते हुज़ूर हैं जिसे जो मिला हुज़ूर के हाथों मिला क्योंकि यहां न अल्लाह की दीन में कोई क़ैद है न हुज़ूर की तक़सीम में। (मिरात-उल-मनाजीह ज 1 स 187)
आला हज़रत रहमतुल्लाह तआला अलैह फ़रमाते हैं:
रब है मुअत्ती ये हैं क़ासिम रिज़्क़ उस का खाते ये हैं
(हदाइक-ए-बख़्शिश)
मदीने की तमन्ना में जिए जाते हैं दीवाने
के जाने कब हमें आक़ा मदीने में बुलाते हैं
हसद की आग में जल भुन के शैतां ख़ाक उड़ाता है
तेरा जश्न-ए-विलादत धूम से जब हम मनाते हैं
ख़ुदा-ओ-मुस्तफ़ा नाराज़ होते हैं सुनो उन से
जो दाढ़ी को मुंडाते हैं या मुट्ठी से घटाते हैं
ग़ुलामो, मत डरो महशर की गर्मी से चले आओ
वो कौसर के प्याले भर के प्यासों को पिलाते हैं
नज़ारे उन के आगे हेच होते हैं गुलिस्तां के
जो सहरा-ए-मदीना के मनाज़िर देख आते हैं
नहीं हैं नेकियां पल्ले मगर घबरा न ऐ अत्तार
ख़ताकारों को भी वो अपने सीने से लगाते हैं