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जो सिद्क़ दिल से तुम्हारा गुलाम हो जाए

Written by Maulana Muhammad Jamil-ur-Rehman Razvi

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जो सिद्क़-ए-दिल से तुम्हारा गुलाम हो जाए तो उस पे आतिश-ए-दोज़ख हराम हो जाए नज़ूल-ए-रहमत-ए-हक़ भी इसी तरफ को हो जिधर वो सरवर-ए-आली मक़ाम हो जाए इलाही जिस के सबब से ये अर्श-ओ-फ़र्श बने उसी का मेरे भी दिल में क़याम हो जाए खुदा करे के मदीने का हो सफ़र हर साल हमारी उम्र इसी में तमाम हो जाए तुम्हारे रौज़ा-ए-अक़दस पे मेरा दम निकले फ़िराक़-ओ-वस्ल का क़िस्सा तमाम हो जाए