काबा का नाम तक न लिया तैबा ही कहा
पूछा था हम से जिस ने कि नहज़तु किधर की है
काबा भी है उन्हीं की तजल्ली का एक ज़िल
रोशन इन्हीं के अक्स से पुतली-ए-हजर की है
होते कहाँ ख़लील-ओ-बिना काबा-ओ-मिना
लूलाक वाले साहिबी सब तेरे घर की है
मौला अली ने वारी तेरी नींद पर नमाज़
और वो भी अस्र से जो आला ख़तर की है
सिद्दीक बल्कि ग़ार में उस पे दे चुके
और हिफ़्ज़-ए-जाँ तो जान फ़रोश-ए-ग़रर की है
हाँ! तू ने उन को जान उन्हें फेर दी नमाज़
पर वो तो कर चुके थे जो करनी बशर की है
साबित हुआ कि जुमला फ़राइज़ फ़ुरू हैं
असलुल उसूल बंदगी उस ताजवर की है
शर खैर शोर सूर दूर नार नूर
बशरी कि बारगाह ये खैरुल बशर की है
मुजरिम बुलाये आये हैं जा-ऊका है गवाह
फिर रद्द हो कब ये शान करीमों के दर की है
बद हैं मगर उन्हीं के हैं बागी नहीं हैं हम
नज्दी न आये इसको ये मंज़िल ख़तर की है
तुफ़-ए-नज्दी न कुफ़्र न इस्लाम सब पे हर्फ़
काफ़िर उधर की है न इधर की उधर की है
हाकिम हकीम दाद-ओ-दवा दें ये कुछ न दें
मरदूद ये मुराद किस आयत ख़बर की है
शक्ल-ए-बशर में नूर-ए-इलाही अगर न हो
क्या क़द्र उस ख़मीर-ए-माये-ओ-मदर की है
नूर-ए-इलाह क्या है मोहब्बत हबीब की
जिस दिल में ये न हो वो जगह खूक-ओ-ख़र की है
ज़िक्र-ए-ख़ुदा जो उन से जुदा चाहो नज्दियो!
वल्लाह ज़िक्र-ए-हक़ नहीं कुंजी सक़र की है
बे उन के वास्ता के ख़ुदा कुछ अता करे
हाशा ग़लत ग़लत ये हवस बे-बसर की है
मक़्सूद ये हैं आदम-ओ-नूह-ओ-ख़लील से
तुख़्म-ए-करम में सारी करामत समर की है
उन की नबुवत उन की उबूवत है सब को आम
उम्मुल बशर उन्हीं के पिसर की है
ज़ाहिर में मेरे फूल हक़ीक़त में मेरे नख़्ल
इस गुल की याद में यह सदा बुअल-बशर की है
पहले हो उन की याद के पाए जला नमाज़
यह कहती है अज़ान जो पिछले पहर की है