दरबार-ए-रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम के शायर हज़रत सय्यदुना हस्सान बिन साबित रदियल्लाहु तआला अन्हु अर्ज़ करते हैं: ऐ मेरे आक़ा!
काश ऐसा होता कि मैं आप से पहले बक़ी-उल-ग़रक़द में दफ़्न हो जाता काश!
मैं आज के दिन के लिए पैदा ही न हुआ होता, ख़ुदा की क़सम! जब तक मैं ज़िन्दा रहूँगा अपने महबूब आक़ा सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम के लिए रोता और तड़पता रहूँगा।