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Kaash! Phir Mujhe Hajj Ka Izn Mil Gaya Hota

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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काश! फिर मुझे हज्ज का, इज़्न मिल गया होता और रोते रोते मैं, काश! चल पड़ा होता हाये! फूटी क़िस्मत ने, हाज़री से रोका है काश! मैं मदीने में, फिर पहुंच गया होता इस सफ़र की तैयारी, कर चुका था मैं सारी काश! मेरी क़िस्मत ने, साथ देदिया होता मेरे क़ल्ब-ए-मुज़्तर को भी क़रार आ जाता हज्ज का मुज़दा कोई काश! आ के दे गया होता मुझ को छोड़ कर तन्हा क़ाफ़िला चला तैबा काश! साथ में ले कर मुझ को भी गया होता काश! इन की राहों को फूल और कांटों को चूमता गया होता झूमता गया होता मिस्ल-ए-साल-ए-रफ़्ता फिर काश! चश्म-ए-तर ले कर सब्ज़ सब्ज़ गुम्बद के रूबरू खड़ा होता मुझ को फिर मदीने में इस बरस भी बुलवाते आप का बड़ा एहसां मुझ पे ये शहा होता ज़ेर-ए-गुम्बद-ए-ख़ज़रा अश्कबार आँखों ने काश! मेरी फ़ुर्क़त का दाग़ धो दिया होता काश! गुम्बद-ए-ख़ज़रा के हसीन जलवों में मेरा रोते रोते ही दम निकल गया होता दम निकल गया होता मेरा उन के क़दमों में साथ गर मुक़द्दर ने मेरा दे दिया होता जिन दिनों मदीने में हाज़री हुई थी काश! मर के उन के कूचे में दफ़्न हो गया होता काश! ऐसा हो जाता गोरे गोरे क़दमों में गिर कर आप का अत्तार आप पर फ़िदा होता