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करम हो जान को है सख़्त ख़तरा या रसूल अल्लाह

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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करम हो जान को है सख़्त ख़तरा या रसूल अल्लाह ना पिस जाए कहीं नाचीज़ ज़र्रा या रसूल अल्लाह बुलाऊं किस तरह मैं अपनी गुटिया में तुम्हें सरवर कि इस क़ाबिल नहीं है मेरा हुजरा या रसूल अल्लाह अगर चश्म-ए-करम हो तो तलातुम ख़ेज़ मौजों से अभी हो पार मेरा डूबा भंवरा या रसूल अल्लाह मैं इस दुनिया-ए-फ़ानी में भी क़ब्र-ओ-हश्र-ओ-जन्नत में हर एक जा पर लगाऊंगा ये नारा या रसूल अल्लाह यक़ीनन जिस के आगे चौदहवीं का चाँद शर्माए तुम्हारा है वो चेहरा निखरा निखरा या रसूल अल्लाह करम से तुम बुलाते हो करम ही से तुम आते हो तुम्हारे ही करम से बख़्त संवरा या रसूल अल्लाह