कौन ऐसा है जिसे ख़ैर-ए-वरा ने न दिया
कोई ऐसा भी है क्या जिस को ख़ुदा ने न दिया
आप के दीन का मुन्किर है बड़ा नाशुक्रा
कोई काफ़िर ही कहेगा कि ख़ुदा ने न दिया
जिस को तुम ने दिया अल्लाह ने उस को बख़्शा
जिस को तुम ने न दिया उस को ख़ुदा ने न दिया
आप के रब ने दिया आप को फ़ज़्ल-ए-कुल्ली
वो दिया तुम को जो औरों को ख़ुदा ने न दिया
वो फ़ज़ाइल तुम्हें बख़्शे हैं ख़ुदा ने जिन का
आप के ग़ैर में इमकान भी आने न दिया
मिस्ल-ए-मुमकिन ही नहीं है तेरा ऐ लासानी
वहम ने भी तो तेरा मिस्ल समाने न दिया
आप के जोड़ का आए तो कहाँ से आए
जब वजूद उस को शह-ए-अर्ज़-ओ-समा ने न दिया
आदम-ओ-नूह इब्राहीम कलीम-ओ-ईसा
उन को सब को मिला क्या रब्ब-ए-अ'ला ने न दिया
बावजूद इस के तुम्हें जो मिला उन को न मिला
आप का रुतबा किसी को भी ख़ुदा ने न दिया
सब मतालिब मेरे बर आए करम से उन के
कोई मतलब भी मेरे दिल का बड़ाने न दिया
कैसी पुर-नूर है जन्नत की फ़ज़ा ऐ नूरी
फिर भी तैबा का मज़ा उस की फ़ज़ा ने न दिया
दुनिया की मोहब्बत
दुनिया की मोहब्बत हर बुराई की जड़ है और किनारा कशी हर ख़ैर-ओ-बरकत की बुनियाद है। (मुकाशफतुल क़ुलूब मुतरजिम, स 85, मक्तबतुल मदीना)