ख़्वाब में भी ऐसा अंधेरा कभी देखा न था
जैसा अंधेरा हमारी क़ब्र में सरकार है
या रसूल अल्लाह! आकर क़ब्र रोशन कीजिए
ज़ात बे-शक आप की तो मनबा-ए-अनवार है
क़ब्र में शाह-ए-मदीना आ चुके मुनकर-नकीर
हो करम! लिल्लाह बंदा बेकस-ओ-नाचार है
या नबी! जन्नत की खिड़की क़ब्र में खुलवाइए
फिर तो फ़ज़्ल-ए-रब से अपनी क़ब्र भी गुलज़ार है
तू ने दुनिया में भी ऐबों को छुपाया या ख़ुदा
हश्र में भी लाज रख लेना कि तू सत्तार है
नेकियां पल्ले नहीं आक़ा शफ़ाअत कीजिए
आप की नज़र-ए-करम होगी तो बेड़ा पार है
या नबी! अत्तार को जन्नत में दे अपना जवार
वास्ता सिद्दीक़ का जो तेरा यार-ए-ग़ार है
काश! हो ऐसी मदीने में कभी हाज़िरी
ये ख़बर आए वतन में मर गया अत्तार है