किस दर्जा है रौशन तन-ए-महबूब-ए-इलाह
जामे से अयाँ रंग-ए-बदन है वल्लाह
कपड़े ये नहीं मैले हैं इस गुल के रज़ा
फ़रियाद को आई है सियाही गुनाह
है जल्वागह-ए-नूर-ए-इलाही वो रू
क़ौसैन की मानिंद हैं दोनों अबरू
आँखें ये नहीं सब्ज़ा-ए-मिज़गाँ के क़रीब
चरते हैं फ़ज़ा-ए-लामकाँ में आहू
मअदूम न था साया-ए-शाह-ए-सक़लैन
इस नूर की जल्वागह थी ज़ात-ए-हसनैन
तिम्सील ने इस साया के दो हिस्से किए
आधे से हसन बने आधे से हुसैन
दुनिया में हर आफत से बचाना मौला
उक़बा में न कुछ रंज दिखाना मौला
बैठूँ जो दर-ए-पाक-ए-पैग़म्बर के हुज़ूर
ईमान पर उस वक़्त उठाना मौला
ख़ालिक़ के कमाल हैं तजद्दुद से बरी
मख़लूक़ ने महदूद तबीयत पाई
बिलजुमला वजूद में है इक ज़ात-ए-रसूल
जिस की है हमेशा रोज़-अफ़ज़ूँ खूबी
हूँ कर दो तो गर्दूँ की बिना गिर जाए
अबरू जो खिंचे तेग़-ए-क़ज़ा कर जाए
ऐ साहिब-ए-क़ौसैन बस अब रद न करे
सह हूँ से तीर-ए-बला फिर जाए
नुक़सान न दे गा तुझे इस्याँ मेरा
गुफ़राँ में कुछ ख़र्च न हो गा तेरा
जिस से तुझे नुक़सान नहीं कर दे माफ़
जिस में तेरा कुछ ख़र्च नहीं दे मौला