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किस मुँह से कहूँ रश्क-ए-अनादिल हूँ मैं

Written by Imam Ahmad Raza Khan Qadri

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किस मुँह से कहूँ रश्क-ए-अनादिल हूँ मैं शाइर हूँ फ़सीह-ए-बे-ममासिल हूँ मैं हक़्क़ा कोई सनअत नहीं आती मुझ को हाँ यह है कि नुक़सान में कामिल हूँ मैं दीगर तोशा में ग़म-ओ-अश्क का सामाँ बस है अफ़ग़ान-ए-दिल-ए-ज़ार-ए-हदी ख़्वाँ बस है रहबर की रह-ए-नात में गर हाजत हो नक़्श-ए-क़दम-ए-हज़रत-ए-हस्सान बस है दीगर हर जा है बुलन्दी-ए-फ़लक का मज़कूर शायद अभी देखे नहीं तैबा के क़ुसूर इन्सान को इंसाफ़ का भी पास रहे गो दूर के ढोल हैं सुहाने मशहूर