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Kya Theek Ho Rukh-e-Nabvi Par Misal-e-Gul

Written by Imam Ahmad Raza Khan Qadri

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क्या ठीक हो रुख़-ए-नबवी पर मिसाल-ए-गुल पामाल-ए-जलवा-ए-कफ़-ए-पा है जमाल-ए-गुल जन्नत है उन के जलवा से जोयाए रंग-ओ-बू ऐ गुल हमारे गुल से है गुल को सवाल-ए-गुल उन के क़दम से सिलअ-ए-ग़ालिया हुई जिनां वल्लाह मेरे गुल से है जाह-ओ-जलाल-ए-गुल सुनता हूँ इश्क़-ए-शाह में दिल होगा ख़ूँ फ़िशां यारब ये मुज़दा सच हो मुबारक हो फ़ाल-ए-गुल बुलबुल-ए-हरम को चिह ग़म-ए-फ़ानी से फ़ायदा कब तक कहे हाए वो ग़ुन्चा-ओ-दलाल-ए-गुल गमगीन है शौक-ए-ग़ाज़ा-ए-खाक-ए-मदीना में शबनम से धुल सकेगी न गर्द-ए-मलाल-ए-गुल बुलबुल ये क्या कहां मैं कहां फज़्ल-ए-गुल कहां उम्मीद रख के आम है जूद-ओ-नवाल-ए-गुल बुलबुल! घिरा है अब्र-ओ-ला मुर्शिदा हो के अब गिरती है आशियाना पे बर्क-ए-जमाल-ए-गुल यारब हरा भरा रहे दाग-ए-जिगर का बाग हर माह-ए-माह बहार हो हर साल-ए-साल-ए-गुल रंग-ए-मिज़गां से कर के ख़जिल याद-ए-शाह में खेंचा है हम ने कांटों पे इत्र-ए-जमाल-ए-गुल मैं याद-ए-शाह में रोऊं करें अनादिल हजूम हर अश्क-ए-लाला-फाम पे हो एतमाल-ए-गुल हैं अक्स-ए-चेहरा से लब-ए-गुलगूं में सुर्खियां डूबा है बद्र-ए-गुल से शफ़क़ में हिलाल-ए-गुल नत-ए-हुज़ूर में मुतरन्नम है अंदलीब शाखों के झूमने से अयां वज्द-ओ-हाल-ए-गुल बुलबुल गुल-ए-मदीना हमेशा बहार है दो दिन की है बहार फ़ना है माल-ए-गुल शैखैन इधर निसार, ग़नी-ओ-अली उधर गुंचा है बुलबुलों का यमीन-ओ-शुमाल-ए-गुल चाहे खुदा तो पाएंगे इश्क-ए-नबी में खुल्द निकली है नामा-ए-दिल-ए-पुरखून में फाल-ए-गुल कर उस की याद जिस से मिले चैन अंदलीब देखा नहीं कि खार-ए-अलम है ख्याल-ए-गुल देखा था ख्वाब खार-ए-हरम अंदलीब ने खटका किया है आंख में शब भर ख्याल-ए-गुल उन दो का सदक़ा जिन को कहा मेरे फूल हैं कीजिए रज़ा को हश्र में खंदां मिसाल-ए-गुल