क्योंकर न हो मक्के से सिवा शान-ए-मदीना
वो जबके हुआ मस्कन-ए-सुल्तान-ए-मदीना
मक्के को शरफ़ है तो मदीने के सबब से
इस वास्ते मक्का भी है क़ुर्बान-ए-मदीना
होता है फ़लक का सर-ए-तस्लीम यहाँ ख़म
अल्लाह रे बुलन्दी तेरी ऐवान-ए-मदीना
आते हैं सर-ए-अजज़ झुकाये हुए लाखों
शाहान-ए-जहाँ पेश-ए-गदायान-ए-मदीना
बुलबुल कभी भूले से न ले नाम-ए-चमन का
देखा ही नहीं उसने गुलिस्तान-ए-मदीना
लाखों ने लगाये हैं तेरे कूचे में बिस्तर
थोड़ी सी जगह हम को भी ऐ जान-ए-मदीना
पहुँचादे तू महबूब के दर पर मुझे या रब
ले जाऊँ न दुनिया से अरमान-ए-मदीना