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क्योंकर न हो मक्के से सिवा शान-ए-मदीना

Written by Maulana Muhammad Jamil-ur-Rehman Razvi

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क्योंकर न हो मक्के से सिवा शान-ए-मदीना वो जबके हुआ मस्कन-ए-सुल्तान-ए-मदीना मक्के को शरफ़ है तो मदीने के सबब से इस वास्ते मक्का भी है क़ुर्बान-ए-मदीना होता है फ़लक का सर-ए-तस्लीम यहाँ ख़म अल्लाह रे बुलन्दी तेरी ऐवान-ए-मदीना आते हैं सर-ए-अजज़ झुकाये हुए लाखों शाहान-ए-जहाँ पेश-ए-गदायान-ए-मदीना बुलबुल कभी भूले से न ले नाम-ए-चमन का देखा ही नहीं उसने गुलिस्तान-ए-मदीना लाखों ने लगाये हैं तेरे कूचे में बिस्तर थोड़ी सी जगह हम को भी ऐ जान-ए-मदीना पहुँचादे तू महबूब के दर पर मुझे या रब ले जाऊँ न दुनिया से अरमान-ए-मदीना