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Maah-e-Taaban Tu Hua Mehar-e-Ajam Maah-e-Arab

Written by Mustafa Raza Khan Qadri

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माह-ए-ताबां तू हुआ मेहर-ए-अजम माह-ए-अरब हैं सितारे अंबिया मेहर-ए-अजम माह-ए-अरब हैं सिफ़ात-ए-हक़ के नूरी आईने सारे नबी ज़ात-ए-हक़ का आईना मेहर-ए-अजम माह-ए-अरब कब सितारा कोई चमका सामने ख़ुर्शीद के हो नबी कैसे नया मेहर-ए-अजम माह-ए-अरब आप ही के नूर से ताबिंदा हैं शम्स-ओ-क़मर दिल चमक जाए मेरा मेहर-ए-अजम माह-ए-अरब क़ब्र का हर ज़र्रा इक ख़ुर्शीद-ए-ताबां हो अभी रुख़ से पर्दा दो हटा मेहर-ए-अजम माह-ए-अरब कूचा-ए-पुरनूर का हर ज़र्रा रश्क-ए-मेहर है वाह क्या कहना तेरा मेहर-ए-अजम माह-ए-अरब रूसिया हूं मुंह उजाला कर मेरा जान-ए-क़मर सुबह कर या चांदना मेहर-ए-अजम माह-ए-अरब नय्यर-ए-चर्ख-ए-रिसालत जिस घड़ी ताले हुआ औज पर था ग़ुलग़ला मेहर-ए-अजम माह-ए-अरब आप ने जब मशरिक़-ए-अनवार से फ़रमाया तुलू दामन-ए-शब फट गया मेहर-ए-अजम माह-ए-अरब ज़ुल्मत-ए-शब मिट गई जब आप जलवा गर हुए रात थी पुर दिन हुआ मेहर-ए-अजम माह-ए-अरब तुम ने मग़रिब से निकल कर इक क़यामत की बपा काफ़िरों पर सरवरा मेहर-ए-अजम माह-ए-अरब आफ़ताब-ए-हाशमी तू ग़ुरूब से ताले हो फिर कर सुवैया नूर का मेहर-ए-अजम माह-ए-अरब हक़ के प्यारे नूर की आंखों के तारे हो तुम्हें नूर-ए-चश्म-ए-अंबिया मेहर-ए-अजम माह-ए-अरब ज़ुल्फ़-ए-वाला की सिफ़त वल्लैल है क़ुरआन में और रुख़ की वज़दुहा मेहर-ए-अजम माह-ए-अरब ज़ुल्मतें सब मिट गईं नारी से नूरी हो गया जिस के दिल में बस गया मेहर-ए-अजम माह-ए-अरब ज़ुल्मतों पर ज़ुल्मतें हैं मेरे मौला क़ब्र में अब तो अपना मुंह दिखा मेहर-ए-अजम माह-ए-अरब मेहर फ़रमा मेहर से इसयां की ज़ुल्मत महव कर जलवा फ़रमा हो ज़रा मेहर-ए-अजम माह-ए-अरब नूर से मामूर हो जाए मेरा सीना अगर दिल पे रख दे अपना पा मेहर-ए-अजम माह-ए-अरब इक इशारे से क़मर के तुम ने दो टुकड़े किए मरहबा सद मरहबा मेहर-ए-अजम माह-ए-अरब नूर की सरकार है तो भीक भी नूरी मिले क़ल्ब-ए-नूरी जगमगा मेहर-ए-अजम माह-ए-अरब है तुम से आलम पुर-ज़िया माह-ए-अजम मेहर-ए-अरब दे दो मेरे दिल को जला माह-ए-अजम मेहर-ए-अरब दोनों जहां में आप ही के नूर की है रोशनी दुनिया व उक़बा में शहा माह-ए-अजम मेहर-ए-अरब कब होते ये शाम ओ सहर कब होते ये शम्स ओ क़मर जल्वा न होता गर तेरा माह-ए-अजम मेहर-ए-अरब शाम ओ सहर के क़ल्ब में शम्स ओ क़मर की आंख में जल्वा है जल्वा आप का माह-ए-अजम मेहर-ए-अरब है रू-सियाह मुझ को क्या आक़ा मेरे आमाल ने करदो उजाला मुंह मेरा माह-ए-अजम मेहर-ए-अरब ख़ुर्शीद-ए-ताबान भीक को आया तेरी सरकार से है नूर से कासा भरा माह-ए-अजम मेहर-ए-अरब ख़ुर्शीद के सर आप के दर की गदाई से रहा सेहरा शहा अनवार का माह-ए-अजम मेहर-ए-अरब कासा-लेसी से तेरे दरबार की महताब भी कैसा मुनव्वर हो गया माह-ए-अजम मेहर-ए-अरब हैं ये ज़मीन ओ आस्मां मंगता इसी सरकार के हैं उन की आंखों की ज़िया माह-ए-अजम मेहर-ए-अरब यूं भीक लेता है दो वक़्ता आस्मां अनवार की सुबह ओ मसा है जुब्बा-सा माह-ए-अजम मेहर-ए-अरब इस जुब्बा-साई के सबब शब को इसी सरकार ने इनाम में टीका दिया माह-ए-अजम मेहर-ए-अरब और सुबह को सरकार से उस को मिला नूरी सिला उम्दा सा झूमर पुर-ज़िया माह-ए-अजम मेहर-ए-अरब जब तुम न थे कुछ भी न था जब तुम हुए सब कुछ हुआ है सब में जल्वा आप का माह-ए-अजम मेहर-ए-अरब इक ज़ुल्मत-ए-इसियां शहा इस पर अंधेरा क़ब्र का करदे ज़िया बदरुद्दुजा माह-ए-अजम मेहर-ए-अरब बर तू शवद अज़ नूर-ए-रब बारान-ए-नूरी रोज़ ओ शब हो ता-अबद ये सिलसिला माह-ए-अजम मेहर-ए-अरब हो मुर्शिदों पर नूर-ए-जां बारिश तुम्हारे नूर की और उन से पाए ये गदा माह-ए-अजम मेहर-ए-अरब बे-शक है आसी के लिए नारी सिला लेकिन शहा नूरी को दो नूरी जज़ा माह-ए-अजम मेहर-ए-अरब