Madine Hamein Le Gaya Tha Muqaddar Madine Mein Kaisa Suroor Aa Raha Tha
Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri
मदीने हमें ले गया था मुक़द्दर मदीने में कैसा सुरूर आ रहा था
ना हम काश! आते यहां लौट कर घर मदीने में कैसा सुरूर आ रहा था
वहां बारिश-ए-नूर होती थी पैहम ना दुनिया की झंझट ज़माने का था ग़म
मिला था हमें क़ुर्ब-ए-महबूब-ए-दावर मदीने में कैसा सुरूर आ रहा था
ख़ुशी भी ख़ुशी से वहां झूमती थी मसर्रत मरे चो तरफ़ घूमती थी
मज़ा भी मज़े ले रहा था वहां पर मदीने में कैसा सुरूर आ रहा था
कभी रूबरू सब्ज़ गुंबद का मंज़र कभी तकते हम उन के दीवार ओ दर
कभी सामने होते मेहराब ओ मिंबर मदीने में कैसा सुरूर आ रहा था
वहां राह चलते हम दस्त-ए-बस्ता दुरूद उन पे पढ़ते कभी सारा रास्ता
कभी नात पढ़ते थे हम रास्ते भर मदीने में कैसा सुरूर आ रहा था
कभी बैठते उन की मस्जिद में जा कर कभी दूर से तकते मेहराब ओ मिंबर
नमाज़ों का भी लुत्फ़ था क्या वहां पर मदीने में कैसा सुरूर आ रहा था
फ़ज़ाएं मुनव्वर हवाएं मुअत्तर समां था वहां किस क़दर कैफ़ आवर
जहां में कहीं भी नहीं ऐसा मंज़र मदीने में कैसा सुरूर आ रहा था
मदीने का सहरा भी रश्क-ए-गुलिस्तां तसदुक़ मुग़ीलां पे बाद-ए-बहारां
तनी थी पहाड़ों पे नूरानी चादर मदीने में कैसा सुरूर आ रहा था
कभी मस्त हो कर शजर झूमते थे तो झड़ झड़ के पत्ते ज़मीन चूमते थे
उठा लेते इन को भी हम बढ़ बढ़ कर मदीने में कैसा सुरूर आ रहा था
वहां तो अंधेरे में भी रोशनी है यहां पर उजाले में भी तीरगी है
वहां दिन थे रौशन तो शब भी मुनव्वर मदीने में कैसा सुरूर आ रहा था
ख़ुशा! धूप थी ठंडी ठंडी वहां पर थी क्या छाओं भी महकी महकी वहां पर
वहां ज़र्रा ज़र्रा है सद रश्क-ए-गौहर मदीने में कैसा सुरूर आ रहा था
यक़ीनन मदीना है सद रश्क-ए-जन्नत मदीने में बैठे है आक़ा की तुर्बत
ऐ अत्तार क्यों छोड़ कर आए वह दर मदीने में कैसा सुरूर आ रहा था
दिल पे ग़म छा गया, या रसूल-ए-खुदा
क्या बनेगा मेरा, या रसूल-ए-खुदा
ज़ोर-ए-तूफ़ान है, फंस गई जान है
अल-मदद नाख़ुदा, या रसूल-ए-खुदा
आह! नाकामियां, हाए बरबादियां
होगा अब मेरा क्या, या रसूल-ए-खुदा
छा गईं तारीखियां, उफ़! ये अंधियारियां
कीजिए चाँदना, या रसूल-ए-खुदा
नाओ मँझधार में, डूबा सरकार में
आह! ऐ नाख़ुदा, या रसूल-ए-खुदा
फंस गया, फंस गया, फंस गया
तुम निकालो शहा, या रसूल-ए-खुदा
क़ल्ब-ए-ग़िरबाल है, हाल बे-हाल है
तेरे बीमार का, या रसूल-ए-खुदा
क़ल्ब-ए-नाशाद है, चैन बरबाद है
हो करम सय्यदा, या रसूल-ए-खुदा
दीद-ओ-दिल को क़रार, ऐ शह-ए-ज़ी-वक़ार
सदक़ा-ए-सिद्दीक़ का, या रसूल-ए-खुदा
बिगड़ी क़िस्मत संवार, ऐ मेरे ताजदार
सदक़ा-ए-फ़ारूक़ का, या रसूल-ए-खुदा
दूर आफ़ात हों, ठीक हालात हों
सदक़ा-ए-उस्मान का, या रसूल-ए-खुदा
हम सभी एक हों, एक हों नेक हों
अज़-पए-मुर्तज़ा, या रसूल-ए-खुदा
ऐसे बरबाद हों, फिर न आबाद हों
दुश्मनन-ए-खुदा, या रसूल-ए-खुदा
जिस क़दर हासिदीन, हैं मेरे शाह-ए-दीन
सब का दिल हो सफा, या रसूल-ए-खुदा
हो निगाह-ए-करम, ताजदार-ए-हरम
वास्ता ग़ौस का, या रसूल-ए-खुदा
मैं सरापा ख़ता, हूँ बड़ा रूह-सियाह
हश्र में होगा क्या, या रसूल-ए-खुदा
या शफ़ी-ए-उमम, तुम ही रखना भरम
रोज़-ए-महशर मेरा, या रसूल-ए-खुदा
सरवर-ए-काएनात, अपनी जन्नत में साथ
ले के चलना शहा, या रसूल-ए-खुदा
शाह-ए-दुनिया-ओ-दीन, काम करता नहीं
ज़हन-ए-अत्तार का, या रसूल-ए-खुदा
हो करम या नबी, पार बेड़ा अभी
होगा अत्तार का, या रसूल-ए-खुदा