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Marhaba! Muqaddar Phir Aaj Muskuraya Hai

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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मरहबा! मुकद्दर फिर आज मुस्कुराया है फिर मुझे मदीने में शाह ने बुलाया है खूब मस्जिद-ए-नबवी का हसीन है मंज़र सब्ज़ सब्ज़ गुम्बद पर कैसा नूर छाया है मेरी गन्दी आँखों को उन नजिस निगाहों को शुक्रिया मदीने का बाग़ फिर दिखाया है मुझ सा पापी और बदकार और आप का दरबार! बिल-यकीन मुझ पर भी रहमतों का साया है या नबी! शफ़ा दे दो अज़-पये रज़ा दे दो खूब ज़ोर, इसियाँ के रोग ने दिखाया है जिस को सब ने ठुकराया और दिल को तड़पाया सदके जाऊँ उस को भी आप ने निभाया है नफरतों के दलदल में दुश्मनों के चुंगल में जब कभी फँसा हूँ मैं आप ने बचाया है आदतें गुनाहों की हाय! कम नहीं होतीं आह! नफ़्स-ओ-शैतान ने ज़ोर से दबाया है वारी जाऊँ मैं तुम पर अभी जाओ अब सरवर! कोई दम का हूँ मेहमान दम लबों पर आया है हक़ ने कर दिया मालिक तुम को सब खज़ानों का तुम ने ही खिलाया है तुम ने ही पिलाया है क्यों फ़िदा न हो अत्तार आप पर शह-ए-अबरार इस को अपने दामन में आप ने छुपाया है आप के करम से यह धूम है क़यामत में देखो देखो अत्तार अब कितना खुश खुश आया है