Home/Mufti Ahmad Yar Khan Naeemi/Ma'roozah ba-bargaah-e-Murshid bar-haq Maulana Syed Muhammad Naeemuddin Sahab Qibla Muradabadi Rahmatullahi Alaih

Ma'roozah ba-bargaah-e-Murshid bar-haq Maulana Syed Muhammad Naeemuddin Sahab Qibla Muradabadi Rahmatullahi Alaih

Written by Mufti Ahmad Yar Khan Naeemi

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जिस ने दिखाया तैबा-ओ-क़िबला तुम ही तो हो जिस में नबी को देखा वो शीशा तुम ही तो हो अहल-ए-नज़र के तुम ही तो हो मतमह-ए-नज़र और अहल-ए-दिल के दिल की तमन्ना तुम ही तो हो तुम वारिस-ए-उलूम-ए-हबीब-ए-इलाह हो और नासिर-ए-शरीअत-ए-बैज़ा तुम ही तो हो इस गुलिस्तान-ए-दीं की तुम ही बहार हो और बज़्म-ए-सुन्नियत का उजाला तुम ही तो हो दीं के नईम, मज़हर-ए-शान-ए-मुईन हो कमज़ोर-ओ-बे-नवा का सहारा तुम ही तो हो सब अहल-ए-अक़्ल सद्र-ए-अफ़ाज़िल न क्यों कहें वो सब हैं ख़ातम उन के नगीना तुम ही तो हो है नज्दियों के क़ल्ब में आरा तुम्हारी ज़ात और सुन्नियों की आँख का तारा तुम ही तो हो तक़रीर जिस की क़हर-ए-इलाही अदु पे है और अहल-ए-दीं पे रहमत-ए-मौला तुम ही तो हो जिस का क़लम कि नेज़-ए-बातिल-शिकन बना और दीन-ए-मुस्तफ़ा का है पाया तुम ही तो हो हम सब थे जहल की शब-ए-तारीक में फँसे शब जिस से कट गई वो सवेरा तुम ही तो हो दिल की मुराद आप की ख़ुशनूदी-ए-मिज़ाज और सालिक-ए-फ़क़ीर के मंशा तुम ही तो हो गुज़ारी उम्र सारी खिदमत-ए-दीन-ए-मुहम्मद में दिल ओ जां से मुईन-ए-दीन-ए-ख़त्म-उल-मुरसलीन तुम हो तुम्हारी दीद हम सब खादिमों की ईद है आक़ा क़रार-ए-बेक़रारां और राहत-ए-क़ल्ब-ए-हज़ीं तुम हो मुनव्वर आप से है बज़्म-ए-ईमानी ओ ईक़ानी सिराज-ए-बज़्म-ए-इरफ़ान साहिब-ए-इल्म-उल-यक़ीन तुम हो न क्यों अह्ल-ए-ज़बां फ़ख़्र-उल-अमायल आप को मानें अमायल-ए-ख़ातम-ए-दीन और ख़ातम के नगीं तुम हो हवा गो है मुखालिफ़ और हैं आदाए-दीन दरपै मगर क्या ख़ौफ़ हो सालिक को जब उस के मुईन तुम हो