मेरे पास बख़्शिश की मोहरी सनद है
यह कहता है ख़त-ए-शफ़ीआ तुम्हारा
फिरें किस लिए तिश्ना कामान-ए-महशर
है लबरेज़ रहमत का दरिया तुम्हारा
बहुत ख़ुश हैं उश्शाक़ जब से सुना है
क़यामत में होगा नज़ारा तुम्हारा
नहीं है अगर ज़ुहद-ओ-ताअत तो क्या ग़म
वसीला तो लाया हूँ मौला तुम्हारा
हो तुम हाकिम-ओ-फ़ातेह-ए-बाब-ए-रहमत
कि है वस्फ़-ए-इन्ना फ़तहना तुम्हारा
अमल पूछते जाते हैं सरकार आओ
कहीं डर न जाए निकम्मा तुम्हारा
जो अंबार-ए-इसयां हैं सर पर तो क्या ग़म
बहा देगा एक दम में अबला तुम्हारा
डरे आफ़ताब-ए-क़यामत से क्यों कर
जो बंदा हुआ मेरे आक़ा तुम्हारा