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मेरे पास बख़्शिश की मोहरी सनद है

Written by Maulana Muhammad Jamil-ur-Rehman Razvi

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मेरे पास बख़्शिश की मोहरी सनद है यह कहता है ख़त-ए-शफ़ीआ तुम्हारा फिरें किस लिए तिश्ना कामान-ए-महशर है लबरेज़ रहमत का दरिया तुम्हारा बहुत ख़ुश हैं उश्शाक़ जब से सुना है क़यामत में होगा नज़ारा तुम्हारा नहीं है अगर ज़ुहद-ओ-ताअत तो क्या ग़म वसीला तो लाया हूँ मौला तुम्हारा हो तुम हाकिम-ओ-फ़ातेह-ए-बाब-ए-रहमत कि है वस्फ़-ए-इन्ना फ़तहना तुम्हारा अमल पूछते जाते हैं सरकार आओ कहीं डर न जाए निकम्मा तुम्हारा जो अंबार-ए-इसयां हैं सर पर तो क्या ग़म बहा देगा एक दम में अबला तुम्हारा डरे आफ़ताब-ए-क़यामत से क्यों कर जो बंदा हुआ मेरे आक़ा तुम्हारा