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मोहब्बत में अपनी गुमा या इलाही

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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मोहब्बत में अपनी गुमा या इलाही न पाऊं मैं अपना पता या इलाही रहूं मस्त ओ बेखुद मैं तेरी विला में पिला जाम ऐसा पिला या इलाही मैं बेकार बातों से नीच के हमेशा करूं तेरी हम्द ओ सना या इलाही मरे अश्क बहते रहें काश हर दम तेरे ख़ौफ़ से या ख़ुदा या इलाही तेरे ख़ौफ़ से तेरे डर से हमेशा मैं थर-थर रहूं कांपता या इलाही मरे दिल से दुनिया की चाहत मिटा कर कर उल्फ़त में अपनी फ़ना या इलाही तू अपनी विलायत की ख़ैरात दे दे मरे ग़ौस का वास्ता या इलाही गुनाहों ने मेरी कमर तोड़ डाली मरा हश्र में होगा क्या या इलाही गुनाहों के अमराज़ से नीम जां हूं पये मुर्शिदी दे शफ़ा या इलाही बना दे मुझे नेक नेकों का सदक़ा गुनाहों से हर दम बचा या इलाही मरा हर अमल बस तेरे वास्ते हो कर इख़लास ऐसा अता या इलाही इबादत में गुज़रे मरी ज़िंदगानी करम हो करम या ख़ुदा या इलाही मुसलमां है अत्तार तेरी अता से हो ईमान पर ख़ात्मा या इलाही