मुहम्मद मुस्तफा जब हश्र में तशरीफ़ लाएंगे
तो अपने नाम लेवों को इशारे में छुड़ाएंगे
जो महशर में पुकारेंगे अगिसनी या रसूल अल्लाह
तो उन की दस्तगीरी के लिए सरकार आएंगे
रहा है विर्द जिन का या रसूल अल्लाह दुनिया में
वो महशर में तुफ़ैल-ए-शाह-ए-दीं इनाम पाएंगे
अगरचे खाती-ओ-आसी हैं हम लेकिन यक़ीन ये है
रसूल अल्लाह हमारी हश्र में बिगड़ी बनाएंगे
जहन्नम चीख़ता जब अर्सा-ए-महशर में आएगा
सियाह कारों को वो दामन-ए-रहमत में छुपाएंगे
गुनाहगारों की बख़्शिश का रहेगा उन के सर सेहरा
शफ़ाअत का रसूल अल्लाह को दूल्हा बनाएंगे