मुझ को आका मदीने बुलाना, सब्ज़ गुम्बद का जलवा दिखाना
मुझ को आका मदीने बुलाना, सब्ज़ गुम्बद का जलवा दिखाना
तुम नक़ाब अपने रुख से उठाना अपने क़दमों से मुझ को लगाना
आना आना मेरे सरवर-ए-आना, आकर आंखों में मेरी समाना
मुझ को उल्फ़त का साग़र पिलाना, मेरा सीना मदीना बनाना
अब घड़ी हाय! रुख़सत की आई, माह-ए-रम्ज़ान से होगी जुदाई
दीद अब ग़म-ए-मदीने का दीदो मुझ को ईदी में शाह-ए-ज़माना
वास्ता लाड़ली फ़ातिमा का, वास्ता ग़ौस-ओ-अहमद रज़ा का
वास्ता मेरे मुर्शद ज़िया का, मुझ को दीवाना अपना बनाना
गो गुनाहगार भी हूँ तो तेरा अगरचे बदकार भी हूँ तो तेरा
मैं सियह कार भी हूँ तो तेरा बहर-ए-ख़ाक-ए-मदीना निभाना
रुख़सत अब माह-ए-रम्ज़ान की है ईद या मुस्तफ़ा आ गई है
ग़म-ए-मदीने का ईदी में दीदो अपने ग़ौस-ए-शाह-ए-ज़माना