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Mujh ko Allah se mohabbat hai

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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मुझ को अल्लाह से मोहब्बत है ये उसी की अता ओ रहमत है जिस को सरकार से मोहब्बत है उस की बख़्शिश की ये ज़मानत है दिल में क़ुरआन की मेरे अज़मत है और प्यारी हर एक सुन्नत है सब से अच्छी नबी की सीरत है चांद से भी हसीन सूरत है मिल गई मुझ को तेरी निस्बत है ये शरफ़ है बड़ी सआदत है आल ओ असहाब से मोहब्बत है और सब औलिया से उल्फ़त है ये सब अल्लाह की इनायत है मिल गई मुस्तफ़ा की उम्मत है ग़ौस ओ ख़्वाजा की दिल में उल्फ़त है क़ल्ब में इश्क़-ए-आला हज़रत है मरहबा! अपनी खूब क़िस्मत है पीर ओ मुर्शिद की दिल में चाहत है आशिक़ान-ए-नबी से उल्फ़त है दुश्मनान-ए-नबी से नफ़रत है हाए दुनिया की दिल में चाहत है नफ़्स की ये खुली शरारत है न तलबगार-ए-माल-ओ-दौलत है, इस गदा को करम की हाजत है दो जहां में वही सलामत है, जिस मुसलमान पे रब की रहमत है या नबी! फंस गया हलाकत है, ये गदा साएल-ए-शफ़ाअत है हक़ से उम्मीद-ए-अफ़्व-ओ-रहमत है, तेरे सदक़े में मिलनी जन्नत है एक अर्से से दिल में रघबत है, सू-ए-तैबा चलूं ये हसरत है एक मुद्दत से हिज्र-ओ-फ़ुरक़त है, क्या मदीने की अब इजाज़त है? आह! पल्ले न कुछ तिलावत है, न दुरूदों की कोई कसरत है आह! इस्यां की ख़ूब कसरत है, या नबी! इल्तिजा-ए-रहमत है ऐसी इस्यां की पड़ गई लत है, फिर वही बाद-ए-तौबा हालत है नेक बंदों पे रब की रहमत है, हर गुनाह बाइस-ए-हलाकत है आ गया आह! वक़्त-ए-रहलत है, ये गदा तालिब-ए-ज़ियारत है आंख नम है न कुछ नदामत है, आह! आमाल की ये शामत है मौत सर पर है तुझ पे हैरत है, जाग क्यों मह्व-ए-ख़्वाब-ए-ग़फ़लत है तेरी अत्तार क्या हक़ीक़त है, जो है सरकार की बदौलत है