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मुझ को दुनिया की दौलत न ज़र चाहिए

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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मुझ को दुनिया की दौलत न ज़र चाहिए, शाह-ए-कौसर की मीठी नज़र चाहिए हाथ उठते ही बर आए हर मुद्दआ, वो दुआओं में मौला असर चाहिए आशिक़ान-ए-नबी के है दिल की सदा, सब्ज़ गुंबद के साए में घर चाहिए ज़ौक़ बढ़ता रहे अश्क बहते रहें, मुज़तरिब क़ल्ब और चश्म-ए-तर चाहिए रात दिन इश्क़ में तेरे तड़पा करूँ, या नबी! ऐसा सोज़-ए-जिगर चाहिए या ख़ुदा जिस्म से जान जब हो जुदा, जलवा-ए-शाह पेश-ए-नज़र चाहिए बस मदीने में दो गज़ ज़मीन दीजिए, और न कुछ ऐ शह-ए-बह्र-ओ-बर चाहिए हम ग़रीबों को रोज़े पे बुलवाइए, राह-ए-तैयबा का ज़ाद-ए-सफ़र चाहिए अपने अत्तार पर हो करम बार बार, इज़्न-ए-तैयबा का बार-ए-दीगर चाहिए